नई दिल्ली। मध्य पूर्व में गहराते अमेरिका-ईरान युद्ध ने भारत की आर्थिक स्थिरता के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। खाड़ी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया ‘7 अपपीलों’ ने देश में नई चर्चा छेड़ दी है। इसे महज एक सुझाव माना जाए या आने वाली किसी बड़ी आर्थिक मंदी का संकेत? विपक्ष ने इसे सरकार की नाकामी करार दिया है, लेकिन अगर इन अपीलों के पीछे छिपे गणित को समझें, तो यह देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने की एक गहरी रणनीतिक कवायद नजर आती है।
भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है, जिसकी कीमतें अब 120 डॉलर के पार जा चुकी हैं। ऐसे में पीएम की पहली अपील—पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और मेट्रो-EV अपनाने की सीधे तौर पर आयात बिल को कम करने की कोशिश है। इसी कड़ी में ‘वर्क फ्रॉम होम’ को बढ़ावा देना भी ईंधन की भारी बचत का एक जरिया है। दूसरी तरफ, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना खरीदार है। हर साल करीब 5 लाख करोड़ रुपये का सोना बाहर से आता है, जिससे देश का व्यापार घाटा बढ़ता है और रुपया कमजोर होता है। पीएम द्वारा एक साल तक सोना न खरीदने की अपील इसी ‘डॉलर’ को बचाने का एक रास्ता है ताकि देश मंदी की चपेट में न आए।
यह संकट केवल शहरों तक सीमित नहीं है, पीएम ने किसानों से भी रासायनिक खाद का उपयोग 50% कम करने और सौर पंप अपनाने का आग्रह किया है। गौरतलब है कि, यूरिया और पोटाश जैसे उर्वरकों के लिए हम काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं और खाद सब्सिडी का बोझ पहले ही पौने दो लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। इसके साथ ही, गिरते रुपये और डॉलर की बढ़ती मांग को देखते हुए गैर-जरूरी विदेश यात्राओं को टालने की सलाह भी दी गई है। संक्षेप में, पीएम मोदी की ये अपीलें संकेत दे रही हैं कि भारत एक ‘अघोषित आर्थिक युद्ध’ की तैयारी कर रहा है, जहाँ जनता का थोड़ा सा त्याग देश को बड़े वित्तीय संकट से बचा सकता है।
