अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण तनाव को खत्म करने की कोशिशों में एक बड़ा कूटनीतिक फेरबदल हुआ है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर, जो लंबे समय से दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे थे, अब इस रेस से बाहर होते नजर आ रहे हैं। उनके द्वारा बढ़ाए गए शांति प्रस्ताव को ईरान ने ठुकरा दिया है। ईरान का साफ कहना है कि वह अमेरिका की ‘एकतरफा’ शर्तों पर झुकने वाला नहीं है। मुनीर की विफलता के बाद अब कतर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल rahman अल-थानी फ्रंटफुट पर आ गए हैं। उन्होंने मियामी में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप के बेहद करीबी जेरेड कुशनेर से मुलाकात कर नए सिरे से समझौते का खाका तैयार किया है।
इस पूरी कवायद के पीछे सबसे बड़ी वजह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आगामी चीन दौरा (13-15 मई) है। व्हाइट हाउस चाहता है कि ट्रंप के बीजिंग पहुंचने से पहले एक पन्ने के संक्षिप्त समझौते पर सहमति बन जाए ताकि वैश्विक तेल बाजार और खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता लौट सके। ईरान ने फिलहाल अमेरिका की उन शर्तों को खारिज कर दिया है जिसमें उसके यूरेनियम ठिकानों को नष्ट करने की बात कही गई थी। ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर ईरानी जवाब को ‘अस्वीकार्य’ बताया है। ऐसे में कतर की भूमिका अहम हो गई है, क्योंकि अल-थानी को ‘डील मेकर’ माना जाता है; उन्होंने ही पहले अफगानिस्तान संकट में अमेरिका की लाज बचाई थी।
ईरान का कतर पर गहरा भरोसा है, यही वजह है कि युद्ध के दौरान भी कतर में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर ईरान ने कोई हमला नहीं किया। अब पूरी दुनिया की नजरें अल-थानी की अगली तेहरान यात्रा पर टिकी हैं। क्या कतर वह करिश्मा कर पाएगा जो पाकिस्तान नहीं कर सका? यदि यह डील सफल होती है, तो न केवल खाड़ी में शांति आएगी बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बड़ी राहत मिलेगी। फिलहाल, ट्रंप के चीन रवाना होने से पहले के अगले 48 घंटे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बेहद निर्णायक होने वाले हैं।
