कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने ममता बनर्जी के एक पुराने और बड़े फैसले को पलटते हुए राज्य में धर्म आधारित मुस्लिम आरक्षण को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। सरकार ने ओबीसी (OBC) आरक्षण में चल रहे धार्मिक वर्गीकरण को खत्म कर अब 2010 से पहले की मूल सूची को बहाल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है।
राज्य कैबिनेट की अहम बैठक के बाद सामाजिक कल्याण मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस फैसले की आधिकारिक घोषणा की। सरकार के इस कदम से अब ओबीसी सूची के 66 पारंपरिक समुदायों को सरकारी नौकरियों और पदों में 7 प्रतिशत आरक्षण का सीधा लाभ मिलेगा। यह निर्णय मई 2024 के कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश के अनुपालन में लिया गया है, जिसमें कोर्ट ने 2010 के बाद अवैध रूप से जोड़ी गई जातियों को रद्द करने को कहा था।
पहले बंगाल में ओबीसी आरक्षण को दो श्रेणियों में बांटा गया था- कैटेगरी-ए (अधिक पिछड़ा) को 10% और कैटेगरी-बी को 7% आरक्षण मिलता था। नई व्यवस्था के तहत इस विभाजन को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। अदालत के आदेश के बाद 2010 से 2012 के बीच जुड़े 77 समुदायों का ओबीसी दर्जा खत्म हो गया है, जिससे लगभग 12 लाख प्रमाणपत्र प्रभावित हुए हैं। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया है कि जिनकी नौकरियां पहले ही लग चुकी हैं, वे सुरक्षित रहेंगी।
बहाल की गई नई सूची में कपाली, कुर्मी, सूत्रधार, कर्मकार, स्वर्णकार, नाई (नापित), तांती, धानुक, खंडैत, तुरहा, देवांग और ग्वाला जैसे पारंपरिक हिंदू समाज के अंग शामिल हैं। इसके साथ ही पिछड़ा वर्ग के रूप में पहचान रखने वाले तीन मुस्लिम समुदायों- पहाड़िया, हज्जाम और चौदुली को भी इस सूची में बरकरार रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में आगामी प्रस्तावित जनगणना से ठीक पहले हुआ यह घटनाक्रम बंगाल के पूरे जातिगत और चुनावी समीकरण को बदल कर रख देगा।
