ज्यों-ज्यों अहंकार बढ़ता गया त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया-रंजन श्रीवास्तव

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राम मंदिर ट्रस्ट को दान में सिर्फ वही रामचरितमानस नहीं मिली होगी जिसकी आज देशभर में चर्चा है- भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव एस. लक्ष्मीनारायण द्वारा उनकी मां के गहनों को पिघला कर सोने से मढ़ी हुई. पर लगता है कि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय सहित ट्रस्ट के वे पदाधिकारी जो राम मंदिर में चंदा चोरी के बाद आज सवालों के घेरे में हैं उनको या तो रामचरितमानस पढ़ने का समय नहीं मिला या फिर पढ़कर भी अहंकार वशीभूत वे रामचरितमानस के भाव को आत्मसात नहीं कर पाए. अहंकार पर एक चौपाई अक्सर लोगों द्वारा कही जाती है- “जब अहंकार करै नर भाई. मिटै बिबेक होइ दुखदाई”. यानी जब मनुष्य अहंकार करता है, तब उसका विवेक नष्ट हो जाता है और बाद में यह अहंकार अत्यंत दुखदाई परिणाम देता है. रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अहंकार को सभी दुखों और पापों की जड़ बताया है. उत्तर कांड में है- “मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला. तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला.. अहंकार सिव अति दुख पावा. कुंभज मुनि बिग्यान दृढ़ावा”. यानी सभी रोगों की जड़ ‘मोह’ है. और उन रोगों से फिर बहुत से ‘शूल’ यानी कष्ट और दुख पैदा होते हैं. अहंकार एक ऐसा भयानक रोग है जिससे स्वयं शिव जी ने भी बहुत दुख पाया था. इसीलिए कुंभज मुनि ने इस अहंकार को छोड़कर ज्ञान और विज्ञान को दृढ़ करने पर ज़ोर दिया. इस समय जब राम मंदिर में चंदा चोरी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा है तथा इसके प्रमुख केंद्र बिंदु में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय तथा उनके दो सहयोगी अनिल मिश्रा तथा गोपाल राव हैं, बहुत से लोग इस बात को ज़ोर-ज़ोर से कह रहे हैं कि चंपत राय की देखरेख में गलतियां हो सकती हैं और हुई भी हैं पर वे बेईमान नहीं हो सकते. यही कारण है कि संघ ने लगभग 5 दशकों से जुड़े अपने इस प्रचारक की ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं किया है तथा यही कारण है कि उनको भाजपा की उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने एक तरह से अभी तक क्लीन चिट दी हुई है. वैसे अभी इन्वेस्टिगेशन जारी है और विपक्ष सहित अयोध्या के ही बहुत लोगों की मांग है कि चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव पर भी एफआईआर दर्ज की जाए क्योंकि यह संभव नहीं है कि ट्रस्ट द्वारा नियुक्त कर्मचारी इतने बड़े पैमाने पर चोरी करते रहें और उनके आकाओं को इस बात की खबर नहीं रही हो.
दरअसल चंपत राय के नाम पर सर्वाधिक विवाद होने का कारण उनका अहंकार ही बताया जा रहा है. जब ट्रस्ट की ओरिजिनल डीड तैयार हुई थी तो उसमें चंपत राय का ट्रस्टी के तौर पर नाम था ही नहीं पर अचानक उनको ट्रस्ट में आजकल की मॉडर्न भाषा में वाइल्ड कार्ड एंट्री मिलती है और ना सिर्फ वे ट्रस्ट में जगह पाते हैं बल्कि उनको सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद महासचिव का दे दिया जाता है. चूंकि चंपत राय लंबे समय से राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े हुए थे और साथ में संघ के लंबे समय से प्रचारक होते हुए विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष भी थे अतः संघ और वीएचपी के नेतृत्व के आशीर्वाद के कारण उनको यह सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल गई. पर मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार अयोध्या तथा ट्रस्ट के ही कई लोगों का कहना था कि चंपत राय ने इस पद पर अपना स्वाभाविक अधिकार मान लिया और धीरे-धीरे राम मंदिर प्रबंधन के सारे सूत्र उन्होंने अपने हाथ में ले लिए. चूंकि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की उम्र 88 वर्ष हो चुकी है और वे अस्वस्थ भी रहते हैं अतः उनका दखल ट्रस्ट के काम में नहीं के बराबर था. वे ही एक ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति हैं जो चंपत राय की मनमर्जी पर थोड़ा लगाम लगा सकते थे. अन्य किसी और ट्रस्टी में जिनमें भारत सरकार के तथा उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारी भी थे उनमें इतना साहस ही नहीं था कि चंपत राय पर संघ और वीएचपी के वरदहस्त के कारण उनसे व्यवस्था में कमियों को लेकर उनको कुछ कह पाते. परिणाम यह हुआ कि चंपत राय ने ऐसे लोगों की फौज इकट्ठा कर ली जो उनकी हां में हां मिलाते, उनके अहं को संतुष्ट रखते थे तथा ट्रस्ट और मंदिर के सभी महत्वपूर्ण प्रबंध सूत्रों को अपने हाथ में लेकर उसमें भारी भ्रष्टाचार करते थे. वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा जो स्वयं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य रह चुके हैं उन्होंने अपने प्रोग्राम में बताया कि चंपत राय ने संघ की इस सलाह की भी अनसुनी कर दी कि ट्रस्ट की व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत है. सवाल यही है कि अगर चंपत राय इतने ईमानदार हैं तो उन्होंने अपने आसपास बेईमानों की फौज कैसे खड़ी कर ली? दूसरा, उन्होंने कुछ करोड़ों की ज़मीन को ट्रस्ट के लिए कई गुना दाम पर कैसे खरीद ली जबकि यह हो नहीं सकता कि चंपत राय को ज़मीन का रेट ना पता हो? जो भी हो, त्यागपत्र देने के बाद तथा उसको स्वीकार कर लिए जाने के बाद भी चंपत राय ने पत्र लिखकर और उसे सार्वजनिक करके अपनी मंशा जाहिर कर दी है कि वे मैदान नहीं छोड़ने वाले और एसआईटी की पूरी जांच के बाद सभी बिंदुओं पर अपना पक्ष रखेंगे. तो क्या चंपत राय के पास ऐसा कुछ है जो कई बड़े लोगों को असहज कर सकता है?