लोकतंत्र अर्थात जनता की शक्ति की शुरुआत पाँचवी वीं शताब्दी ईसा पूर्व प्राचीन यूनानी राजनेता क्लीस्थेनेस ने की थी। उन्होंने बहिष्कार की व्यवस्था शुरू करके कुलीन वर्ग के प्रभाव को कम किया। उनके द्वारा कानून शासन लागू करने, नागरिक भागीदारी बढ़ाने एवं शासन में आमूलचूल परिवर्तन करने से एथेंस के नागरिकों को शक्ति मिली। ईसा पूर्व छठी शताब्दी के आस-पास प्राचीन भारत में राजतंत्रीय महाजनपद के होने के बावजूद बौद्ध संघों और वैशाली के लिच्छवियों में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली अपवाद के रूप में गण संघ के नाम से मौजूद थी। जिसे आज भी विश्व का प्रथम गणतंत्र माना जाता है। भारत का संविधान बनाते समय, बी.आर. अंबेडकर ने भी बौद्ध संघों के इन लोकतांत्रिक सिद्धांतों का अध्ययन किया था। शासन, समानता और मानवाधिकारों पर आधारित लोकतंत्र का विकास अमेरिका एवं फ्रांस में हुई क्रांति के पश्चात सत्रहवीं एवं अ_ारहवीं सदी में हुआ । भारत में लोकतंत्र की प्रणाली शुरुआत 15 अगस्त 1947 को हुई एवं 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ तथा लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को प्रभावी रूप से लागू किया गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर को भारतीय लोकतंत्र का जनक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने में मुख्य भूमिका निभाई थी। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद समूचे विश्व में आधुनिक लोकतंत्र का विस्तार तेजी से शुरू हुआ और अब्राहम लिंकन की व्याख्या ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासनÓ लोकतंत्र का मूलमंत्र बनी। दुनिया में लोकतंत्र को मजबूती एवं वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से 1983 में गैर-लाभकारी निजी अमेरिकी संस्था राष्ट्रीय लोकतंत्र निधि का गठन किया गया। इस संस्था का मुख्य काम है मानवाधिकारों, स्वतंत्र मीडिया एवं कानून व्यवस्था को बढ़ावा देना विशेष रूप से उन देशों में जहाँ लोकतंत्रात्मक प्रणाली खतरे मे हो। यही वजह है कि अधिनायकवाद, तानाशाही और आपातकाल जैसी स्थितियाँ निर्मित होने के बावजूद हमेशा जीत लोकतांत्रिक प्रणाली को ही मिली। लोकतंत्र में पक्ष एवं विपक्ष दोनों की भूमिका गाड़ी के दो पहिए की तरह होती है। सुचारू रूप से उसे गति देने के लिए दोनों में संतुलन का होना आवश्यक होता है। विपक्ष की भूमिका इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि उसका दायित्व होता है सरकार के निरंकुशता एवं गलत नीतियों पर अंकुश लगाना तथा वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करके लोकतंत्र में संतुलन व पारदर्शिता बनाए रखना न कि केवल खामियां निकाल कर विकास की गति में अवरोध पैदा करना। विपक्ष का प्रमुख काम होता है रचनात्मक आलोचना द्वारा सरकार की नीतियों व कानूनों में सुधार लाने में मदद करना, सत्ता के केंद्रीकरण को रोकना, राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करना, लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखना, सरकार के साथ संतुलन स्थापित करना, सत्ता के केंद्रीकरण को रोकना, लोकतंत्र के स्तंभों की कमियों की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराना, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना,समावेशिता को बढ़ावा देना,सरकार की नीतियों, कार्यों और योजनाओं की समीक्षा करना एवं समस्याओं को समाधान सहित उजागर करना। क्योंकि विपक्ष को सत्ता और जनता के बीच का सेतु एवं.नागरिकों की आवाज का प्रतिनिधित्वकर्ता माना जाता है। विपक्ष और सत्ताधारी दल के बीच के संतुलन को लोकतंत्र का आधार है। आज भारत में विपक्ष का दिन ब दिन कमजोर होते जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण है विपक्षी दलों के नेताओं के बीच मतभिन्नता की बाहुल्यता जिसके चलते उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। यथा-प्रबल बहुमत का अभाव, अवसरवादी दलबदलू नेताओं के कारण राजनीतिक अस्थिरता, जाँच एजेंसियों में उलझे रहना, अपराधीकरण का दंश झेलना, वित्तीय फंड न जुटा पाना, मीडिया में उचित स्थान एवं समय का न मिलना एवं वंशवाद का खामियाजा भुगतना आदि।इसीलिए विपक्ष आज लोगों की आकांक्षाओं व अपेक्षाओं में खरा नहीं उतर पा रहा है। ठोस विजन या रणनीति के अभाव में वह वैचारिक रूप से भी कई खेमों में बँटा दिखाई देता है। उनमें राष्टहित कम कुर्सी दौड़ जीतने की ललक अधिक दिखाई देती है। भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष के पुनर्जीवित होने के लिए जरूरी है कि वह अपने महत्व को समझे और निजी स्वार्थ एवं सत्तामोह को छोड़ ब्रिटिश कैबिनेट प्रणाली की तरह शैडो कैबिनेट का गठन करके पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ राष्ट्रहित एवं जनहित के लिए काम करने का प्रयास करें।
लोकतंत्र का इतिहास एवं विपक्ष की भूमिका – डॉ.माणिक विश्वकर्मा
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