ये फैसला क्यों लिया गया? – संजय सक्सेना

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की नई किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का अध्याय शामिल किए जाने पर भारी नाराजगी जताई है। ऐसी आपत्ति यदि विपक्ष जताता तो इसे राजनीतिक रंग दे दिया जाता, चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में आ गया और प्रधान न्यायाधीश ने दखल दिया है, इसलिए अधिक गंभीर हो गया है। हालांकि अब सरकार ने इसे हटाने की बात कही है, लेकिन सवाल तो उठेगा ही कि आखिर इसे शामिल क्यों किया गया? और, अगर सीजेआई नाराजगी ना जताते तो क्या सरकार अध्याय पाठ हटाती? बुधवार को प्रधान न्यायाधीश ने कहा- किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। कानून अपना काम करेगा। कोर्ट इस मामले पर खुद एक्शन लेने के लिए विचार कर रहा है। दरअसल, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग यानि एनसीईआरटी ने 8वीं क्लास की नई सोशल साइंस टेक्स्टबुक में ज्यूडिशियरी में करप्शन पर एक सेक्शन शुरू किया है। इस चैप्टर में सुप्रीम कोर्ट के 81 हजार, हाईकोट्र्स के 62 लाख 40, डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट के 4 करोड़ 70 लाख पेंडिंग केस की संख्या भी बताई गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने कोर्ट में एनसीईआरटी के इस कदम के बारे में बताया। उन्होंने कहा- 8वीं के छात्रों को न्यायिक भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है। यह चिंता का विषय है। हम यहां बार की चिंता लेकर आए हैं। एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सेलेक्टिविटी, यह दूसरे एरिया में भी है लेकिन ज्यूडिशियल करप्शन में नहीं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह किताब बेसिक स्ट्रक्चर के ही खिलाफ लगती है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा- प्लीज कुछ दिन इंतजार करें। बार और बेंच सभी परेशान हैं। सिस्टम का हर स्टेकहोल्डर सच में परेशान है, मुझे बहुत सारे कॉल और मैसेज आ रहे हैं। सभी हाई कोर्ट के जज परेशान हैं। मैं इस मामले को खुद से देखूंगा। कानून अपना काम करेगा। हमारे देश में न्याय प्रणाली को आज भी अपेक्षाकृत विश्वसनीय माना जाता है। जब व्यक्ति हर तरफ से निराश हो जाता है, तो अदालत का सहारा लेता है, यानि कहीं न कहीं भरोसा कायम है। फिर, यदि सरकार के ही एक अंग द्वारा न्याय प्रणाली में भ्रष्टाचार की बात कही जाये, उसे पाठ्य पुस्तक का अंग बनाया जाये, बच्चों को पढ़ाया जाये, तो इसे क्या सही ठहराया जायेगा? कहीं न कहीं हमें न्याय व्यवस्था का सम्मान करना होगा। नई पीढ़ी को आदर्श वाले पाठ इसलिए पढ़ाये जाते हैँ ताकि वो उस आदर्श पर चलने का प्रयास करे। धार्मिक और आध्यात्मिक कथा, कहानियों के अंश पाठ्य पुस्तकों में इसलिए शामिल किये जाते हैँ ताकि उनसे प्रेरणा ले सकें। अब भले ही सरकार ने इस फैसले को वापस लेने की बात कही है, पर ये अध्याय किसके कहने पर और क्यों शामिल किया गया, इसकी पड़ताल होनी चाहिए। ये बहुत गंभीर मामला है।