करोड़ों भारतीयों की आस्था का प्रतीक राम मंदिर में चढ़ावा चोरी प्रकरण इन दिनों सुर्खियों में है। इस मामले में सोमवार को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की हुई बहुप्रतीक्षित बैठक में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉक्टर अनिल कुमार मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। जबकि विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव को भी ट्रस्ट से बाहर कर दिया गया है। अब पूर्व आईएफएस अधिकारी कृष्ण मोहन, चंपत राय की जगह लेंगे उन्हें ट्रस्ट का अंतरिम महासचिव बनाया गया है। वे ट्रस्ट के संचालन का संपूर्ण कामकाज देखेंगे। इसके अलावा राम मंदिर के रोजमर्रा के कामकाज की निगरानी के लिए सीईओ की नियुक्ति का भी निर्णय लिया गया है। बैठक के बाद ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने इन फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ट्रस्ट ने स्वीकार किया है कि दान चोरी की घटना से उसकी छवि को नुकसान पहुंचा है, इसलिए श्रद्धालुओं का भरोसा फिर से हासिल करना जरूरी है। गिरि ने चंपत राय की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि मेरी नजर में वे बेदाग हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर उन्हें ट्रस्ट से क्यों हटाया गया? खैर, यह ट्रस्ट का निर्णय है। लेकिन बाकी फैसले महत्वपूर्ण है, क्योंकि राम मंदिर केवल एक धार्मिक परिसर नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था और वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। ऐसे में मंदिर के चढ़ावे में हुई कथित चोरी के मामले में वरिष्ठ पदाधिकारियों का इस्तीफा मंजूर किया जाना एक सामान्य घटना नहीं है। यह आस्था, जवाबदेही और विश्वसनीयता को कटघरे में खड़े करना जैसा है। दरअसल, धार्मिक संस्थानों की सबसे बड़ी पूंजी श्रद्धालुओं का विश्वास होता है। वे यह मानकर दान देते हैं कि उनका अर्पण जनकल्याण के कार्यों में लगाया जाएगा। लेकिन श्रीराम मंदिर में ऐसा नहीं हुआ। लिहाजा, लोगों की आस्था और विश्वास को चोट पहुंची। यदि एक बार किसी का विश्वास टूट जाए तो उसे दोबारा हासिल करना आसान नहीं है। फिलहाल ट्रस्ट ने वरिष्ठ पदाधिकारियों के इस्तीफे स्वीकार कर उचित कदम उठाया है। लेकिन जिम्मेदार लोगों के पद छोड़ देने मात्र से विवाद खत्म नहीं हो जाता। जरूरी यह है कि पूरे मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समय में जांच हो तथा दोषी चाहे जो कोई भी हो उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई हो। चूंकि श्रीराम मंदिर राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय से यह राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख मुद्दा रहा है। इसलिए इस पर आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक है, पर चढ़ावा चोरी के इस मामले में जरूरी है कि राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर इस मुद्दे को आस्था, श्रद्धा और विश्वास के रूप में देखा जाए। राम मंदिर किसी एक दल विशेष की जागीर नहीं, यह देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। बहरहाल, देखना होगा कि ट्रस्ट की नई कार्यप्रणाली कैसी होगी? नए महासचिव ने विश्वास जताया है कि वे ट्रस्ट की साख और जनता के भरोसे को बहाल करने का प्रयास करेंगे। ऐसे में लोगों को उम्मीद है कि चढ़ावा चोरी के इस प्रकरण की जांच निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से होगी। यदि ऐसा हुआ तो इस विवाद का न केवल हल निकलेगा बल्कि श्रीराम मंदिर की विश्वसनीयता और मजबूत होगी। आस्था तभी सुरक्षित रहती है, जब उसके साथ सत्य, निष्ठा और जवाबदेही हो, लिहाजा ट्रस्ट को इन पर अमल करते हुए नए सिरे से काम करने की जरूरत है। बाकी राम जाने…!
चढ़ावा चोरी…अब राम जाने…! -संजीव वर्मा
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