चरणस्पर्श से हैलो, हाय एवं हे तक– डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘

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चरण स्पर्श करना एव प्रणाम करना बड़ों के प्रति आदर, श्रद्धा और विनम्रता प्रकट करने की सदियों पुरानी परंपरा है। भारतीय संस्कृति में अभिवादन के अनेक तरीके प्रचलित हैं जैसे चरणस्पर्श, दंडवत, प्रणाम, राम-राम, राधे-राधे, जय श्री कृष्ण, नमस्कार, नमस्ते, हाथ जोडऩा, सिर झुकाना, गले लगना, हाथ मिलाना, जय श्री कृष्ण, उठकर खड़ा होना एवं दंडवत होना आदि। हर रोज बड़ों के अभिवादन करने से आयु, विद्या, यश और बल में बढ़ोतरी होती है। अभिवादन संबंधों को प्रगाढ़ करने एवं उसे स्थायित्व देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अभिवादन के तौर तरीकों से व्यक्ति विशेष के सभ्य एवं सुसंस्कृत होने तथा उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का अंदाजा आसानी से लग जाता है। कुछ लोग भारतीय संस्कृति एवं पारिवारिक संस्कार के अनुरूप चलने पर गर्व महसूस करते हैं तो कुछ लोग स्वयं को आधुनिक एवं स्मार्ट दिखाने के लिए पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करने लगते हैं अर्थात अभिवादन के नाम पर स्माइल के साथ हैलो, हाय एवं हे का संबोधन करने लगते हैं। सनातन धर्म में अपने से बड़े के आदर के लिए प्रणाम करना एवं चरण स्पर्श करना सबसे उत्तम माना गया है। चरण छूने की परंपरा सदियों पुरानी है प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से चरण स्पर्श करने से कई लाभ हैं। माना जाता है कि पैर के अंगूठे में ऊर्जा प्रसारित करने की शक्ति होती है।आशीर्वाद के तौर पर सिर के उपरी भाग पर हाथ रखने से पूजनीय व्यक्ति की सकारात्मक उर्जा सामने वाले के शरीर पर प्रवेश कर जाती है। इसीलिए कुछ उच्च कोटि के श्रेष्ठ साधक या तपस्वी अपने चरणों का स्पर्श नहीं करने देते ताकि उनकी संचरित प्राण-उर्जा कुपात्रों तक आसानी से न पहुँच जाए। पाखंडी लोगों का चरणस्पर्श चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो भी इसलिए नहीं किया जाता कि कहीं उनकी नकारात्मक उर्जा का संचरण चरणस्पर्श करने वाले पर न हो जाए। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सिर को उत्तरी ध्रुव और पैरों को दक्षिणी ध्रुव माना गया है। चूँकि गुरुत्व ऊर्जा या चुंबकीय ऊर्जा उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित होकर अपना चक्र पूरा करती है। इसका मतलब यह हुआ कि गुरुत्व ऊर्जा या चुंबकीय ऊर्जा हमेशा उत्तरी ध्रुव से प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित होकर अपना चक्र पूरा करती है। अत: शरीर में उत्तरी ध्रुव सिर से सकारात्मक ऊर्जा दक्षिणी ध्रुव पैरों की ओर प्रवाहित होती है और पैरों की ओर ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। पैरों से हाथों द्वारा इस ऊर्जा के ग्रहण करने को ही हम चरण स्पर्श कहा जाता है। पैर छूना सिफऱ् परंपरा नहीं है इससे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास भी जुड़ा है। तीन तरह से पहले झुककर, दूसरा घुटने के बल बैठकर एवं तीसरा साष्टांग प्रणाम करने से रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। प्रणाम संस्कृत का शब्द है जिसमें प्र – का अर्थ आगे बढऩा एवं नम का अर्थ है झुकना या नमन करना।प्रणाम कहना नमस्ते कहने से अधिक विनम्र होता है। वेदों एवं भगवद्गीता जैसे ग्रंथों में प्रणाम शब्द का प्रयोग ईश्वर, गुरु और प्रबुद्धजनों के समक्ष नतमस्तक होने के लिए किया गया है। रामचरितमानस के बालकाण्ड की चौपाई में स्पष्ट रूप से लिखा है कि – प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥ अर्थात श्री रघुनाथजी प्रात:काल जल्दी उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं, चरण स्पर्श करते हैं। इसके बाद उनकी आज्ञा लेकर नगर के कार्यों को करते हैं। श्रीराम के ऐसे दिव्य चरित्र को देखकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न होते हैं। आज अभिवादन के तरीकों बहुत बदलाव आ गया है। चरण स्पर्श को भूलकर लोग हैलो- हाय करने लगे हैं। यह परिवर्तन हमारी जीवन शैली और रिश्तों में आई गिरावट को दर्शाते हैं। चरण स्पर्श बड़ों या पूजनीय व्यक्तियों का किया जाता है तथा कोई उम्र या पद में बड़ा हो, तो हाथ जोड़कर ‘नमस्तेÓ या ‘प्रणामÓ कहा जाता है। जबकि हैलो- हाय आधुनिकता, पश्चिमीकरण और कामकाजी जीवन की देन है। समय की कमी के कारण लोग हैलो- हाय का अधिक प्रयोग करते हैं।वैसे भी आज लोग भागदौड़ भरी जिंदगी में दूर से ही नमस्कार करना पसंद करते हैं। रोज़ सुबह किसी भी काम को शुरू करने से पहले घर के बड़े बुजर्गों एवं माता – पिता के चरण स्पर्श अवश्य करने चाहिए इससे कार्य में सफलता मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है।सनातन धर्म,संस्कृति और परंपरा में आज भी संतों और बड़ों बुजुर्गों के पैर छूने की परंपरा कायम है हालांकि आजकल चरणस्पर्श करने में भी निजी स्वार्थ ,वंशवाद एवं जातिवाद का असर दिखाई देने लगा है। चरण स्पर्श और प्रणाम करने से अहंकार का नाश एवं विनम्रता व सकारात्मकत उर्जा का संचार होता है। शास्त्रों के अनुसार, प्रतिदिन बड़ों के चरण स्पर्श करने से आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि एवं मानसिक शांति प्राप्त होती है ।