सृष्टि में मनुष्य ही ऐसा जीव है, जो वस्त्रों से तन ढकता है। स्त्री हो या पुरुष उसे तन ढकने के लिए परिधान की आवश्यकता होती है। परिधान एक पहचान भी है। भारत के अलग-अलग राज्यों में निवासरत लोगों का परिधान भी अलग-अलग होता है। परिधान देखकर पंजाबी, गुजराती ,मराठी, बंगाली,छत्तीसगढिय़ा होने का अनुमान लग जाता है। अनादि काल से स्त्री परिधान में सर्वाधिक प्रचलित लोकप्रिय परिधान साड़ी ही है। तभी तो महाकवि भूषण ने द्रौपदी चीरहरण के समय निर्मित स्थिति को देखते हुए अद्भुत रस सहित संदेह अलंकार में लिखा है- ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है,सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है’। भारतीय परिधान में साड़ी के प्रति ललक ऐसी है कि विदेशी महिलाएं भी साड़ी पहनने को आतुर रहती हैं। साड़ी का पहनावा भी बड़ा ही चमत्कारिक है। जिसमें ना तो कोई बटन,ना कोई चैन ना ही कोई नाड़ा होता है। भारतीय संस्कृति पारंपरिक शिल्प कौशल और नारीत्व श्रृंगार साड़ी की गरिमा को बढ़ाने के लिए प्रत्येक वर्ष 21 दिसंबर को विश्व साड़ी दिवस मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में महिलाओं का महापर्व तीजा तो साड़ी के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इस पर्व में सही साड़ी न मिलने पर अनेक चंद्रमुखी ‘तीजहारिन’ सुरजमुखी बन जाती हैं।नारी जाति की सुंदरता के साथ-साथ इज्जत- मान- मर्यादा को साड़ी बनाए रखती है। अनेक विभागों में इसे ‘यूनिफॉर्म’ के रूप में रखा गया है। अस्पताल, स्कूल, थाना और तो और हवाई जहाज में भी ज्यादातर ‘व्योम बालाएं’ अर्थात विमान परिचारिकाएं साड़ी ही पहनती हैं। दुर्भाग्यजनक बात है कि हाल ही में छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग ने नारी समुदाय के इस गरिमामय प्रमुख परिधान की जमकर धज्जियां उड़ा दी है। प्रदेश में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को देने हेतु चयनित- वितरित साडिय़ों में एक नहीं अनेक खोट सामने आए हैं। खोट की खाड़ी में डूबी साड़ी की लंबाई निर्धारित आकार से कम है। साड़ी का रंग इतना कच्चा है कि एक बार की धुलाई में ही वह बदरंग हो जा रही है। साड़ी की बनावट ऐसी है कि आराम से चाय छान सकते हैं,अर्थात चाय छन्नी की तरह साड़ी में भरपूर पारदर्शिता है। तालाब में मछली पकडऩे के लिए जाल की तरह इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। मजे की बात यह है कि साड़ी की आपूर्ति छत्तीसगढ़ शासन द्वारा संचालित छत्तीसगढ़ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के द्वारा की गई है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने अधिकारियों से लेकर मंत्री तक शिकायत की है कि उन्हें प्रदत्त साड़ी घटिया है। यूनिफॉर्म के रूप में उसे कार्यस्थल पर पहना जाता है,अत: गरिमा के अनुरूप साड़ी का स्तर होना आवश्यक है। महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े एक महिला ही हैं,वे भली भांति जानती है कि साड़ी की उपादेयता एक नारी जाति के लिए अनेक अर्थों में कितना ज्यादा है। बहरहाल छत्तीसगढ़ की कढ़ाई में साड़ी की आंच ने जबरदस्त उबाल ला दी है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी इस साड़ी प्रकरण को लेकर भारी नाराजगी दिखाई है। एक सप्ताह के भीतर नई साड़ी उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं। प्रदेश में कार्यरत लाखों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कैसे सात दिन के भीतर उम्दा साड़ी की आपूर्ति होगी? यह भी
‘तेल देखो तेल की धार देखो ‘ वाली बात हो गई है। साड़ी की गरिमा को गिराने वाले अनाड़ी अधिकारियों की काली करतूत के लिए जांच समिति भी गठित की गई है। अपनी अपनी मैडम के लिए महंगी महंगी और कार्यकर्ताओं के लिए निम्न कोटि की साडिय़ां खरीदने वाले अधिकारियों की जांच तो होगी किन्तु पूर्व में ऐसे जांच के परिणाम टांय टांय फीस ही रहे हैं। इस आधार पर कह सकते हैं कि साड़ी घोटालेबाजों पर कोई आंच नहीं आएगी।अंधेर नगरी चौपट राजा की तर्ज पर जांच कमेटी का अध्यक्ष जिस अधिकारी को बनाया गया है वही अधिकारी खराब साड़ी खरीदने वाली परचेज कमेटी का प्रभारी था। यह तो वही बात हुई की चोर को ही कोतवाल बना दिया गया। साड़ी की अस्मिता से खिलवाड़ करते अनाड़ी खिलाड़ी भूल गए कि छत्तीसगढ़ की मिनी माता, बिलासा बाई केवटिन, राधाबाई, केतकी बाई,पोचीबाई,रमोतिन माडिय़ा,रानी अवंतीबाई लोधी,रामकुवंर बघेल आदि साड़ीधारी अनेक वीरांगनाओं ने फिरंगियों के छक्के छुड़ा दिए थे। इतिहास में ऐसी अनेक घटनाएं दर्ज है जो बताती हैं ‘साड़ी धारी नारी जब खड़ी होती है तो जीत बड़ी होती है’। महाभारत की कथा में द्रौपदी चीरहरण के समय दुशासन द्वारा साड़ी खींचने का प्रसंग आता है, जिसमें द्रौपदी की आबरू बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने साड़ी की लंबाई को अनंत करने की कला करिश्मा को प्रदर्शित किया। छत्तीसगढ़ के मंत्री संतरी बेचारे इस अद्भुत कला करिश्मा से अनभिज्ञ हैं। वे साड़ी की लंबाई बढ़ाना तो नहीं जानते पर हां साड़ी की लंबाई घटाने में उन्हें महारत हासिल है। ऐसे महारथियों की लगाम बड़े-बड़े नेताओं के हाथ में होती है। तभी तो साड़ी की लंबाई घटाने की कला में निपुण अधिकारीगण बेखौफ अपनी काली करतूत को सुरसा के मुख की तरह बढ़ाने में जरा भी नहीं हिचक रहे हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग में हुए साड़ी घोटाला में यह तय है कि गड़बड़ी हुई है, तो फिर गड़बड़ी करने वालों को सामने लाने में देरी किस बात की हो रही है। जनता यह सवाल पूछते हुए कह रही है कि जो सरकार नारी आरक्षण- स्वावलंबन- सशक्तिकरण के लिए लड़ाई लड़ रही है, उसी सरकार के नाक के नीचे निडरतापूर्वक खराब साड़ी खरीदने का खेला चल रहा है।वह प्रदेश में सुशासन की डावांडोल स्थिति को उजागर कर रहा है।
साड़ी की अस्मिता से खिलवाड़-विजय मिश्रा
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