‘स्वतंत्रता’ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसा पावन संकल्प है, जिसे पाने के लिए अनगिनत वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। आज़ादी का अर्थ केवल राजनीतिक या भौगोलिक रूप से स्वतंत्र होना नहीं है, बल्कि यह गरिमा, समानता और विकास के अवसरों का प्रतीक है। हालांकि, आधुनिक समाज में कई बार स्वतंत्रता की परिभाषा को गलत तरीके से समझा जाता है। कई लोग आज़ादी का अर्थ ‘कुछ भी करने की खुली छूटÓ मान लेते हैं। वास्तविकता यह है कि आज़ादी का अर्थ अराजकता फैलाने का अधिकार कदापि नहीं है, बल्कि यह देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाने का एक महान अवसर और उत्तरदायित्व है। अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बिना कर्तव्यों के अधिकारों की मांग अंतत: समाज को अराजकता की ओर ले जाती है। स्वतंत्रता हमें अभिव्यक्त करने, प्रगति करने और अपने अधिकारों की रक्षा करने का अवसर देती है। अराजकता तब जन्म लेती है जब व्यक्ति अपनी आज़ादी का उपयोग दूसरों के अधिकारों को छीनने और सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए करने लगता है। जब नागरिक अपने असंतोष या विरोध को व्यक्त करने के लिए हिंसा या कानून को हाथ में लेने का रास्ता चुनते हैं, तो वह नागरिक अधिकार नहीं बल्कि स्वेच्छाचारिता होती है। सच्ची स्वतंत्रता वही है जो अनुशासन, कानून का पालन और सर्वजन हिताय की भावना पर आधारित हो। देश में उपलब्ध संसाधन चाहे वे ट्रेनें हों, बसें हों, सड़कें हों, ऐतिहासिक धरोहरें हों, अस्पताल हों या सरकारी कार्यालय, ये किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं हैं। यह सब देश के आम नागरिकों के खून-पसीने की कमाई से निर्मित हुई राष्ट्र की साझी निधि है। जब भी देश में कोई आंदोलन, विरोध या हड़ताल होती है, तो सबसे पहला हमला सार्वजनिक संपत्ति पर होता है। बसों को जलाना, ट्रेनों पर पथराव करना और सरकारी भवनों को क्षति पहुँचाना विरोध दर्ज कराने का तरीका नहीं, बल्कि अपने ही घर को आग लगाने जैसा आत्मघाती कदम है। जब हम किसी ट्रेन, बस या सरकारी इमारत को नुकसान पहुँचाते हैं, तो हम किसी सरकार का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर अपने देश की अर्थव्यवस्था और अपने ही साथी नागरिकों का नुकसान कर रहे होते हैं। उस नुकसान की भरपाई अंतत: देशवासियों के ही टैक्स के पैसों से होती है, जिसका उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा या अन्य विकास कार्यों में किया जा सकता था। हम अक्सर देशभक्ति को सीमाओं पर तैनात सैनिकों के शौर्य या राष्ट्रीय पर्वों पर झंडा फहराने तक सीमित मान लेते हैं। निस्संदेह, सरहद पर देश की रक्षा करना देशभक्ति का सर्वोच्च रूप है, लेकिन एक आम नागरिक के लिए दैनिक जीवन में देशभक्ति का अर्थ और भी व्यापक और व्यावहारिक है। सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना, पर्यावरण को स्वच्छ रखना और नागरिक अनुशासन का पालन करना भी देशभक्ति के ही रूप हैं। भारतीय संविधान में भी यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि ‘सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना और हिंसा से दूर रहना भारत के प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। जब कोई नागरिक किसी बस में तोडफ़ोड़ होने से रोकता है, पार्क में सफाई बनाए रखता है, या किसी ऐतिहासिक इमारत पर खरोंच तक नहीं आने देता, तो वह अपनी देशभक्ति का परिचय दे रहा होता है। यह भावना दर्शाती है कि वह व्यक्ति देश को केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि अपना परिवार और राष्ट्र-संपत्ति को अपनी निजी धरोहर मानता है। एक जीवंत लोकतंत्र में सहमति और असहमति दोनों का स्थान है। विरोध दर्ज कराना नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इसकी एक गरिमा और मर्यादा होती है। भारत की आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने ‘सत्याग्रहÓ और ‘अहिंसाÓ का मार्ग दिखाया था। हिंसा और तोडफ़ोड़ से न तो किसी समस्या का समाधान होता है और न ही विचार मज़बूत होते हैं। आज के युवाओं और नागरिकों को यह समझना होगा कि अपनी मांग रखने के लिए कानून और शांतिपूर्ण तरीकों का सहारा लें। राष्ट्र संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले तत्वों का विरोध करें। आज़ादी का जश्न केवल अधिकारों के उपभोग में नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के निर्वहन में मनाएं। आज़ादी एक बहुत बड़ा अधिकार है और हर अधिकार अपने साथ एक बड़ा दायित्व लेकर आता है। हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि सच्ची आज़ादी अनुशासन के बिना संभव नहीं है। देश की किसी भी संपत्ति का नुकसान अंतत: राष्ट्र की प्रगति को पीछे धकेलता है। आइए 80 वें स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प लें कि हम देश की धरोहरों और सार्वजनिक संपत्तियों का संरक्षण करेंगे और एक जि़म्मेदार नागरिक बनकर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देंगे। यही हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
स्वतंत्रता और कर्तव्य-गिरीश पंकज
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