पटना। बंगाल की सियासत की बात जम्मू-कश्मीर से शुरू करते हैं। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग और पूर्ण राज्य बनाने के लिए जनसंघ के पहले अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे…का नारा गढ़ा था। कश्मीर के पूर्ण एकीकरण की लड़ाई लड़ने वाले मुखर्जी का सपना 66 साल बाद 2019 में पूर्ण हुआ, जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करते हुए अनुच्छेद 370 हटा दिया गया। बड़ा सवाल यह है कि जिस राज्य से जनसंघ को पहला अध्यक्ष मिला था, जिसके संघर्षों से जम्मू-कश्मीर में नया इतिहास रचा गया, क्या उस पश्चिम बंगाल में कमल खिलाकर भाजपा इतिहास रच पाएगी। आपको बता दें की बंगाल की राजधानी कोलकाता की 11 विधानसभा सीटों का रुख ही पूरे राज्य की सत्ता का भविष्य तय करने जा रहा है। इतिहास की विरासत और वर्तमान की सीधी टक्कर में सिटी ऑफ जॉय इस समय बंगाल का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बन गया है। फुटबॉल और क्रिकेट के दीवाने इस शहर में 11 की संख्या का अपना एक रोमांच है। जैसे मैदान पर 11 खिलाड़ी हार-जीत का फैसला करते हैं, ठीक वैसे ही कोलकाता की 11 सीटें तय करेंगी कि नबन्ना यानी सचिवालय पर किसका परचम लहराएगा। फिलहाल सभी सीटों पर तृणमूल का कब्जा है। शहर में घुसते ही हवा का रुख कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। कमल भी जोर दिखा रहा है। मुकाबला सीधा है…तृणमूल की दो पत्तियां बनाम भाजपा का कमल। लोगों का मानना है कि मौजूदा में माहौल में कुछ सीटों पर कमल का खिलना तय है। कांग्रेस और वामपंथ के लिए यहां कोई गुंजाइश नजर नहीं आती। बंगाल में अगर परिर्वतन की सुनामी आती है, तो उसका केंद्र कोलकाता ही होगा। अगर ममता हवा का रुख थामने में कामयाब रहीं, तो भाजपा के लिए सत्ता तक पहुंचना कठिन हो जाएगा।
वहीं कोलकाता की गलियों में इस बार चुनावी सरगर्मी का मिजाज बदला हुआ है। दमदम हवाई अड्डे से शहर में दाखिल होते ही राजनीति की चर्चाएं तीखी हो जाती हैं। टैक्सी चालक सूरज मंडल के शब्दों में कहें तो लड़ाई इस बार बराबर की है। भाजपा ने घेराबंदी मजबूत की है, तो दीदी ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। न्यू टाउन जैसे आधुनिक इलाकों के ड्राइंग रूम से लेकर ढाबे की बेंचों तक, भ्रष्टाचार और हालिया प्रशासनिक चूकों पर असंतोष की लहर साफ दिखती है। यह माहौल संकेत दे रहा है कि इस बार मतदाता खामोश जरूर है, पर उसका फैसला चौंकाने वाला हो सकता है। कोलकाता में आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। सड़कों पर उतरा जनसैलाब और विशेषकर महिलाओं की स्वतःस्फूर्त भागीदारी यह बताती है कि यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि एक सामाजिक उबाल है। भ्रष्टाचार और विकास की सुस्त रफ्तार जैसे मुद्दे अब घर-घर की चर्चा बन चुके हैं। आमतौर पर चुनावी चर्चाओं से दूर रहने वाले कोलकाता में ऐसी टिप्पणियां चौंकाती हैं और परिवर्तन की आहट का संकेत देती हैं। न्यू टाउन के भद्रलोक इलाकों में जाने पर भी यही असंतोष सुनाई देता है। सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त दिगंत बनर्जी भ्रष्टाचार और आरजी कर अस्पताल जैसी हालिया दुखद घटनाओं का उल्लेख करते हुए मानते हैं कि इस बार सत्ता विरोधी लहर का झटका कोलकाता में भी महसूस होगा।
