अपनी धार्मिक मान्यताओं और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाने वाला देवी चामुंडा मंदिर, नवरात्र में करें दर्शन, मनोकामनाएं होगी पूर्ण

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नई दिल्ली। हिमाचल प्रदेश की गोद में बसा चामुंडा देवी मंदिर के बारे में आप सभी ने सुना ही होगा। यह मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं और खूबसूरती को लेकर प्रसिद्ध है। यह मंदिर देवी के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह पालमपुर से लगभग 19 कि.मी. दूर है। यह मंदिर अटूट आस्था और प्राकृतिक सुंदरता का अनोखा संगम है। इस मंदिर से कई धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। आइए इस चैत्र नवरात्र के अवसर पर जानें चामुंडा देवी मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और दर्शन के लिए यहां कैसे पहुंचें।

आपको बता दें की चामुंडा देवी का यह मंदिर 16वीं शताब्दी में बनाया गया था। यह मंदिर बनेर नदी के किनारे स्थित है और इसके पीछे धौलाधार पर्वतमाला की बर्फ से ढकी चोटियां का अद्भुत नजारा पेश करती हैं। इस मंदिर के पीछे एक प्राकृतिक गुफा है, जिसे शिव और शक्ति का निवास स्थान माना जाता है। इस गुफा में नंदीकेश्वर महादेव का शिवलिंग है, जिसके दर्शन करने भक्त दूर-दूर से आते हैं। इसलिए इस मंदिर को चामुंडा नंदीकेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के दोनों तरफ हनुमान-जी और भैरव जी की प्रतिमा बनी है। माना जाता है कि वे दोनों देवी चामुंडा के प्रतिनिधि हैं। पहले यह मंदिर धौलाधार पर्वत श्रंखला पर 16 कि.मी. ऊंची चढ़ाई पर स्थित था, जहां पहुंचना काफी मुश्किल था। भक्तों की इस मुश्किल को हल करने के लिए राजा और एक पुजारी ने देवी से प्रार्थना की कि वे मंदिर को आसानी से पहुंच सकने वाली जगह पर स्थापित करने की अनुमति दें।

देवी ने पंडित के सपने में अपनी सहमति दी। उन्होंने पुजारी को वर्तमान स्थल पर खुदाई करके मूर्ति निकालने का निर्देश दिया। पुजारी ने यह बात राजा को बताई। खुदाई करवाने पर वहां मूर्ति मिली, लेकिन राजा के सिपाही उस मूर्ति को उठा न सके। पंडित के सपने में देवी फिर से प्रकट हुईं और उन्हें निर्देश दिया कि वे खुद जाकर उस मूर्ति की स्थापना करें। इस तरह चामुंडा देवी का मंदिर वर्तमान जगह पर स्थापित हुआ। इस मंदिर से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा दुर्गा सप्तशती से आती है। माना जाता है कि हजारों साल पहले, चण्ड और मुण्ड नाम के दो शक्तिशाली राक्षस इस क्षेत्र में आतंक मचा रहे थे। तब देवी ने काली का रूप लिया और एक भीषण युद्ध के बाद इन दोनों राक्षसों का वध कर दिया। इसी कारण देवी के इस स्वरूप को चामुंडा के नाम से पूजा जाता है। यूं तो यहां साल भर श्रद्धालु आते हैं, लेकिन नवरात्र के दौरान यहां की रौनक देखने लायक होती है। सर्दी में बर्फबारी के कारण मंदिर के पट सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक खुलते हैं। 12-1 बजे तक देवी के भोग का समय होता है। इसके बाद 1 बजे से रात 9 बजे तक मंदिर खुला रहता है। गर्मी के मौसम में मंदिर के दरवाजे सुबह 5 बजे खुल जाते हैं। आरती में शामिल होने के लिए सुबह 8 बजे तक मंदिर पहुंच जाएं और शाम की आरती का समय 7 बजे से है।