चोरी करना घोर निंदनीय अपराध-डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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सामाजिक एवं धार्मिक स्थलों में हो रहीं चोरियां सुरक्षा व्यवस्था की नाकामियों, प्रबंधन से जुड़े लोगों की लापरवाहियों एवं सहयोगी कर्मचारियों की नीयत में आई खोट को उज़ागर करती हैं।देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों से चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या पंथ का क्यों न हो चंदा एवं चढ़ावे का गबन, सरकारी भूमि हड़पने या दानपात्रों से ताले तोड़कर रकम निकालने व मँहगे सामानों एवं प्राचीन कलाकृतियां की चोरी के समाचारों से करोड़ों भक्तों की आस्था को गहरी ठेस पहुंची है। देखा जाए तो लगभग हर बड़े धार्मिक स्थल के प्रबंधन एवं प्रचालन का काम ट्रस्ट के माध्यम से किया जाता है। किसी भी धार्मिक ग्रंथ ने एवं महापुरुषों ने चोरी करने वालों को उचित नहीं ठहराया है। उदाहरण के तौर पर कुरान में चोरी को गंभीर सामाजिक एवं नैतिक अपराध मानते हुए उसे हराम करार दिया गया है तथा इसे रोकने के लिए सूरह अल-माइदा आयतन में चोरी की सज़ा का स्पष्ट आदेश किया गया गया है। बाइबल में चोरी को गंभीर पाप मानते हुए परमेश्वर की ओर से दी गई दस आज्ञाओं में निर्गमन 20:15 में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि है ‘तू चोरी न करनाÓ। बाइबल में केवल भौतिक संपत्ति चुराने को ही नहीं अपितु धोखाधड़ी, बेईमानीएवं किसी का हक मारने को भी चोरी की श्रेणी में रखा गया है। गुरुनानक देव ने चोरी को बहुत बड़ा पाप और नैतिक पतन माना है। उन्होंने हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाने का संदेश दिया है। उनके तीन स्तंभों में से एक है ‘किरत करोÓ अर्थात ईमानदारी से जीवन यापन करो तथा कभी दूसरे के हक़ या मेहनत की कमाई का शोषण न करो। गुरु ग्रंथ साहिब में उन्होंने कहा है कि चोरी का धन परलोक में व्यक्ति के कर्मों को कलंकित करता है।गौतम बुद्ध ने चोरी को अनैतिक एवं मन की अशुद्धि का कारण माना है। उन्होंने कहा है कि बिना दी गई वस्तु को लेना अर्थात चोरी करना मनुष्य को लोभ और अज्ञान की ओर ले जाता है। भगवान महावीर ने जैन धर्म के पांच महाव्रतों में अस्तेय अर्थात चोरी न करना को एक मूल सिद्धांत माना है। उन्होंने कहा है कि किसी भी व्यक्ति को अनुमति के बिना कोई वस्तु नहीं लेनी चाहिए । प्रसिद्ध ग्रंथ भगवद गीता के श्लोक 12 के अनुसार जो व्यक्ति देवताओं एवं प्रकृति द्वारा दी गई सुविधाओं का बिना कृतज्ञता दर्शाए उपभोग तो वह शास्त्रों की दृष्टि में सबसे बड़ा चोर है। गीता में स्पष्ट किया गया है कि चोरी चाहे छोटी हो या बड़ी वह व्यक्ति के नैतिक पतन और विनाश का कारण बनती है। वेदों में चोरी को घोर पाप और अनैतिक कर्म माना गया है । ऋग्वेद और यजुर्वेद में चोरी के विभिन्न स्वरूपों यथा स्तेन-गुप्त चोरी, तस्कर -छीनकर चोरी एवं मनिम्लु -डकैती या लूटमार के उल्लेख सहित यह भी कहा गया है कि व्यक्ति को दूसरे की संपत्ति पर कभी बुरी नजऱ नहीं डालनी चाहिए और सदैव ईमानदारी का मार्ग अपनाना चाहिए। हिंदू धर्म एवं शास्त्रों में मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों से धन,आभूषण या संपत्ति चुराने को महापाप माना गया है। मनुस्मृति में मंदिरों और मूर्तियों से सोना- चांदी चुराने को घोर पाप की श्रेणी में रखा गया है। क्योंकि शास्त्रों में मंदिरों में भक्तों द्वारा अर्पित की गई संपत्ति, दान- पात्र या आभूषणों को ‘देवद्रव्यÓ या भगवान की अमूल्य संपत्ति कहा गया है तथा इस देवद्रव्य का दुरुपयोग या चोरी करने वाले कभी खुश नहीं रहते माना गया है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जो मंदिर या देवताओं की संपत्ति चुराता है, उसे मृत्योपरांत घोर असहनीय यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। यथा स्वर्णहारी तु कृमिकीटो जायते य: स्वर्णं हरते स्तेयाद्रत्नं वा देवमंदिरम्। अर्थात जो व्यक्ति मंदिर से सोना या रत्न चुराता है, वह अगले जन्म में कीड़े- मकोड़ों की योनि में जन्म लेता है और उसे नरक की यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मंदिर या सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा को राजधर्म का मुख्य हिस्सा माना गया है। यह शाश्वत सच है कि भगवान से या धार्मिक स्थलों से चुराई गई हर वस्तु का नकारात्मक प्रभाव चोरी करने वाले के सुख- शांति पर पड़ता है और उसे अपने कृत्य का फल हर हाल में भुगतना पड़ता है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार ‘यो वै देवानां द्रव्याणि हरति स: स्वानि पुण्यानि नाशयतिÓ यानी जो ईश्वर की वस्तुओं की चोरी करता है, वह अपने संचित पुण्यों का स्वयं ही नाश कर लेता है। कहा गया है कि, देवतार्चन वित्तानां हरणे ब्रह्महा भवेत्। अर्थात देवता की पूजा और उनके धन का अपहरण करने वाला व्यक्ति ब्रह्महत्या जैसे महापाप का भागीदार बनता है। जहाँ तक देश के कानून का सवाल है तो भारतीय दंड संहिता की धारा 380 के तहत मंदिर या पूजा स्थल से चोरी करने पर अपराधी को कठोर दंड सहित 7 साल तक की जेल एवं भारी जुर्माना देने का प्रावधान है। सामान्यत: चोरी, डकैती एवं भ्रष्टाचार में लिप्त होने के पीछे के कमज़ोर प्रबंधन, लापरवाही, पारदर्शिता का आभाव, नैतिक मूल्यों में गिरावट, बेरोजगारी, गरीबी, आर्थिक असमानता,नशे की लत, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था, अपराधियों का संरक्षण, मानसिक विकार, लालच, भौतिक सुविधाओं का आकर्षण एवं अवसर की उपलब्धता का बड़ा हाथ होता है। इसलिए हर धार्मिक स्थल का प्रबंधन, देखरेख, लेखाजोखा एवं प्रचालन सत्यनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ अनुभवी लोगों के हाथों में होना चाहिए एवं आर्थिक मामले से जुड़ी हर संवेदनशील गतिविधियों पर क्रियाशील अत्याधुनिक पद्धति द्वारा निगरानी की जानी चाहिए।