विद्या अर्जन का केंद्र बने स्कूल-विजय मिश्रा

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ग्रीष्मावकाश उपरांत नये सत्र के लिए स्कूल खुल गए हैं। नए सत्र के लिए सरकार ने फरमान जारी किया है कि स्कूलों में अमका गान, ढमका गीत, अलाना मंत्र फलाना मंत्र अवश्य करना है। शनिवार को बिना बैग स्कूल आना है। शनिवार को खेलकूद- संगीत- संस्कार- संस्कृति का ज्ञान दिया जावेगा। इससे विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति संस्कार का बीजारोपण होगा। यह सब पढ़ कर ऐसा लग रहा है जैसे सोते से सरकार जाग गई है। गंगा जल पीकर सुधरने का ढोंग कर रही है। जिन बुद्धिजीवियों के मार्गदर्शन में ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं। जिन्हें इन निर्णयों का पालन करवाना है। उनमें से अधिकांश बुद्धिजीवी पचास साठ वर्ष के तो होगें ही। वे सब के सब जरा अपने स्कूली जीवन को याद करें तो यही बात सामने आएगी कि उनके ज़माने में स्कूलों में ढंग के न तो ब्लेक बोर्ड थे, न बैठक व्यवस्था थी लेकिन असल कार्य पढाई बड़ी उम्दा होती थी। साधन कम थे पर साधक सदैव ईमानदारी से साधना पर ध्यान रखते थे।आज की तरह स्कूल नौटंकी केंद्र नहीं विद्या अर्जन केंद्र होते थे। तभी तो उस जमाने के ज्ञानी विद्यार्थियों का दबदबा आज भी कायम है। तब नेतागिरी राजनीति करने वाले कलमुहे भी स्कूल मास्टर से डरते थे। शाला भवन की चौखट चढऩे के पहले माथ नवाते थे। लेकिन पिछले तीन चार दशकों में खासकर राजनीतिज्ञों में आई चारित्रिक गिरावट ने सब मटियामेट कर दिया है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां राजनेताओं का हस्तक्षेप न हो। इसके पीछे प्रशासनिक अधिकारियों का दब्बूपन, भ्रष्टआचरण भी एक बड़ा कारण है। देश के ज्यादातर राजनेता खुद तो अज्ञानी हैं। मूढ़ हैं, पर ज्ञानवान होने का ढोंग करते हुए शिक्षा जगत में नवाचार लाने के लिए आए दिन अजीबोगरीब प्रयोग करवाते हैं। वे भूल जा रहें हैं कि शिक्षक की पहली जिम्मेदारी राष्ट्रनिर्माण की है। इस पुनीत कार्य को साकार करने के लिए देश के भविष्य नौनिहालों को बेहतर शिक्षा संस्कार देकर उनकी नीवं को मजबूत बनाना है। प्राय: देखने में आ रहा है कि आजकल शिक्षकों को उनके मूल काम को छोड़कर वर्ष भर दीगर कार्यों में लगाया जा रहा है। ऐसे में चाहे कितने भी आत्मानंद- विवेकानंद स्कूल खोल लें,उन्नत स्कूल बिल्डिंग, पाठ्यक्रम, प्रयोग शाला हों जाएं ।उससे बेहतर परिणाम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। आज स्कूलों में बी. एड. डी एड पीएचडी जैसे उच्च शिक्षित शिक्षकों की भरमार है, जबकि पहले जमाने के अधिकांस शिक्षक मेट्रिक या ग्रेजुएट ही होते थे,फिर भी पढ़ाई का स्तर आज की तुलना में सौ फीसदी बेहतर था। सरकारी स्कूलों की संख्या भी कम ही थी। अभी तो सरकारी के साथ ही निजी स्कूलों की भी बाढ़ आई हुई है। इसके बावजूद ज्यादातर विद्यार्थियों का ज्ञान अधकचरा हो चला है। भाषा ज्ञान,लेखन, वाचन का स्तर बद से बदतर होता जा रहा है। महाविद्यालयीन शिक्षा की भी यही दुर्दशा है। बाजार में भाझी भाटा बेचने वालों की तरह यूनिवर्सिटी खुल गए हैं। डिग्री बांटने की सेल लगी हुई है। गनीमत अभी एक के साथ एक फ्री की नौबत नहीं आई है। यह सब शिक्षा को तप तपस्या यज्ञ के बजाय व्यवसाय बनाने का ही खेल है।नासमझ तथाकथित शिक्षाविदों की विवेकहीनता हरेक दृष्टि से देश के लिए घातक है। यह देश का दुर्भाग्य है कि नीति-निर्धारक ,नैतिकता की बात करने वाले ही नैतिकता को भूंजकर खाए बैठे हैं। बच्चा वही करता है जो अपने से बड़ो को करते देखता है। अत: शिक्षा के महत्व को समझते हुए जिम्मेदार नीति-निर्धारक दमखम से आगे आएं। बढ़ते भ्रष्टाचार को रोककर नवाचार को बढ़ावा दें। जर्जर होते स्कूल भवनों में बच्चों के जर्जर होते भविष्य को सुधारने स्वआचरण में सदाचरण को सुदृढ़ता से प्रदर्शित करें। ऐसे दौर में पहले जमाने के माता-पिता की तरह अभिभावकगण भी अपने बच्चों के साथ पढ़ाई- लिखाई और उनकी दिनचर्या में अपनी संलग्नता बढ़ाएं। केवल ऊंची फीस, ट्यूशन, कोचिंग देने मात्र से बच्चा आगे नहीं बढ़ जाता। फटी बनियान- चड्डी-पेंट -कमीज में स्कूल आने वाले बच्चे मेरिट में आते हैं। ऐसा क्यों? इस सवाल का मंथन करते हुए साधन उपलब्ध कराने के साथ ही बच्चों को साधना का गुर सिखाएं और साधक बनाएं। सरकार को भी मान लेना चाहिए कि केवल शिक्षा का स्तर सुधार लेंगे तो बच्चा स्वयं ज्ञानवान सुसंस्कारी हो जाएगा।