वॉशिंगटन। ईरान में जारी युद्ध और उससे उपजे भू-राजनीतिक तनाव ने अमेरिका की वैश्विक स्थिति पर गहरा असर डाला है। विश्लेषकों के मुताबिक इस संघर्ष ने न केवल अमेरिका की रणनीतिक पकड़ कमजोर की है, बल्कि रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों को नए अवसर भी प्रदान किए हैं। जहां हाल ही में 14 दिन के संघर्षविराम के बाद भले ही अमेरिका और ईरान दोनों ने जीत का दावा किया हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस घटनाक्रम को अमेरिका के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा है। वहीं इस रिपोर्ट में उन चार प्रमुख पहलुओं को समझाया गया है, जिनके जरिए ईरान में जारी संघर्ष ने 21वीं सदी की वैश्विक महाशक्ति प्रतिस्पर्धा में अमेरिका की स्थिति को कमजोर किया है।
आपको बता दें की अमेरिका लंबे समय से पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक हितों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों ने उसकी चुनौतियां बढ़ा दी हैं। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में सोवियत प्रभाव को सीमित करना था, जबकि साथ ही इस्राइल और पाकिस्तान जैसे सहयोगियों के परमाणु विकास पर नजर रखना भी शामिल था। 2020 के दशक में यह फोकस बदलकर चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने पर केंद्रित हो गया। वहीं, चीन और रूस ने विभिन्न गठबंधनों और कूटनीतिक कदमों के जरिए पश्चिम एशिया में अपनी पकड़ मजबूत की है। चीन ने 2023 में सऊदी-ईरान समझौते में मध्यस्थता की, जबकि रूस ने ईरान और सीरिया के साथ सहयोग बढ़ाया। बदलते हालात में खाड़ी देश अब सुरक्षा और सहयोग के लिए नए विकल्प तलाश रहे हैं। अमेरिका का रणनीतिक फोकस हाल के वर्षों में लगातार पश्चिम एशिया से हटकर इंडो-पैसिफिक और पश्चिमी गोलार्ध की ओर बढ़ रहा था, लेकिन ईरान में छिड़े युद्ध ने इस दिशा को उलट दिया। इराक और अफगानिस्तान के लंबे युद्धों के बाद रूस और चीन ने इसी खालीपन का फायदा उठाते हुए क्षेत्र में अपने सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत किए।
नवंबर 2025 की अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भी पश्चिम एशिया को कम प्राथमिकता देने की बात कही गई थी, लेकिन ईरान युद्ध ने इस नीति से विपरीत स्थिति पैदा कर दी। ट्रंप द्वारा बिना सहयोगी देशों से सलाह किए लिए गए फैसलों ने नाटो और अन्य साझेदारों में असंतोष बढ़ाया। इसका लाभ चीन और रूस को मिला, जो पहले से ही अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच बढ़ती दरारों का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन और जटिल हो गया है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना, जहां से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है, अमेरिकी हितों के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। हालांकि रूस के लिए यह स्थिति लाभकारी रही, क्योंकि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से उसकी युद्ध अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली और अमेरिका के प्रतिबंधों का आंशिक प्रभाव भी कम हुआ। वहीं चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर कुछ दबाव जरूर पड़ा, लेकिन उसने सौर ऊर्जा, बैटरी तकनीक और घरेलू ऊर्जा संसाधनों में निवेश कर अपनी निर्भरता को कम किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन इस तरह के वैश्विक ऊर्जा संकट से निपटने में अमेरिका की तुलना में अधिक सक्षम स्थिति में है। इसके अलावा, घरेलू खपत को बढ़ावा देकर बीजिंग ने अपनी अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से कुछ हद तक सुरक्षित किया है, जबकि अमेरिका का प्रभाव क्षेत्रीय घटनाओं पर कमजोर पड़ता दिख रहा है।
ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका की विरोधाभासी बयानबाजी और बातचीत से हटने के रुख ने उसकी एक निष्पक्ष वैश्विक मध्यस्थ की छवि को कमजोर किया है। इसका सीधा लाभ चीन को मिला है, जिसने कूटनीतिक सक्रियता दिखाते हुए अपनी सॉफ्ट पावर को मजबूत किया और ईरान पर युद्धविराम स्वीकार करने का दबाव बनाया। चीन ने धीरे-धीरे वैश्विक मध्यस्थ के रूप में अमेरिका की भूमिका को चुनौती दी है, जैसा कि उसने पहले ईरान-सऊदी अरब समझौते में भी दिखाया था। वहीं रूस को भी इस संकट से रणनीतिक लाभ मिला, क्योंकि नाटो और अमेरिका के बीच मतभेद बढ़ने से यूक्रेन युद्ध से ध्यान भटका है। कुल मिलाकर यह घटनाक्रम वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत देता है।
