रायपुर। देशभर में आदिवासी समुदायों के बीच डी-लिस्टिंग को लेकर छिड़ी बहस अब छत्तीसगढ़ में भी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन गई है। दिल्ली में आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक समागम में उठी इस मांग के बाद प्रदेश में समर्थन और विरोध दोनों खुलकर सामने आने लगे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने डी-लिस्टिंग की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि यह केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन चुका है। उनका कहना है कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर करने पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। नेताम ने दावा किया कि समाज की भावना इस मांग के साथ है और “देर-सवेर डी-लिस्टिंग होकर रहेगी।” उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर कड़े कानून बनाने की दिशा में प्रयास जारी हैं।
वहीं जशपुर में इस मांग के खिलाफ प्रदर्शन भी देखने को मिला। पूर्व संसदीय सचिव यूडी मिंज और गीता उरांव के नेतृत्व में विरोध जताया गया। यूडी मिंज ने कहा कि, धर्म परिवर्तन के बाद भी आदिवासी समाज अपनी परंपराएं, संस्कृति और सामाजिक पहचान नहीं खोता, इसलिए डी-लिस्टिंग की मांग संविधान की भावना के खिलाफ है। दरअसल, डी-लिस्टिंग का अर्थ किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाना है। आदिवासी संगठनों की मांग है कि, संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन कर धर्म परिवर्तन करने वालों के ST दर्जे की समीक्षा की जाए।
