झीरम पर फैसला आया, लेकिन साजिश का सच अब भी पर्दे में : राजेश तिवारी

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*बड़े नक्सली नेताओं के नाम चार्जशीट से हटाने और सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ नहीं होने पर भी उठाए सवाल*

कांकेर। झीरम घाटी हत्याकांड को लेकर कांग्रेस ने एक बार फिर भाजपा सरकार और एनआईए की जांच पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिला कांग्रेस कमेटी कांकेर में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव राजेश तिवारी ने कहा कि झीरम मामले में न्यायालय का फैसला सामने आ चुका है, लेकिन हमले के पीछे की साजिश, सुरक्षा में कथित चूक और राजनीतिक षड्यंत्र से जुड़े मूल सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।

तिवारी ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि “झीरम में हमलावरों पर कार्रवाई हुई, लेकिन हमले के पीछे कौन था और साजिश कैसे रची गई—इस सच तक जांच को पहुंचने ही नहीं दिया गया।” उन्होंने कहा कि कांग्रेस न्यायालय के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन एनआईए ने अदालत के सामने वही तथ्य रखे, जो उसकी जांच में शामिल किए गए। असली सवाल उन पहलुओं का है, जिनकी जांच ही नहीं की गई या जिन्हें जांच के दायरे में पर्याप्त रूप से नहीं लाया गया।

“मैं परिवर्तन यात्रा का प्रभारी था, 23-24 मई की सुरक्षा 25 मई को कहां गई?”
राजेश तिवारी ने पत्रकारों से कहा कि वे स्वयं उस समय कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के प्रभारी थे, इसलिए यात्रा के दौरान की व्यवस्थाओं और घटनाक्रम से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे। उन्होंने कहा, “मुझे आज भी याद है कि 23 और 24 मई को परिवर्तन यात्रा के दौरान पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था हमारे साथ थी। फिर 25 मई को ऐसा क्या हुआ कि वही सुरक्षा व्यवस्था हटा दी गई या कमजोर पड़ गई? किसके आदेश पर सुरक्षा में बदलाव हुआ? आखिर घटना वाले दिन ही ऐसा क्यों हुआ? यह झीरम का बहुत बड़ा सवाल है, जिसका जवाब आज तक नहीं मिला।”


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तिवारी ने कहा कि जब लगातार चल रही परिवर्तन यात्रा को पहले सुरक्षा दी जा रही थी, तो 25 मई 2013 को झीरम घाटी पहुंचने से पहले सुरक्षा व्यवस्था में कथित बदलाव क्यों हुआ, इसकी तह तक जाना जरूरी था। उन्होंने सवाल किया कि यात्रा का मार्ग किसने और किन परिस्थितियों में बदलवाया, सुरक्षा से जुड़े निर्णय किस स्तर पर लिए गए और इन सभी पहलुओं की जांच क्यों नहीं हुई? उन्होंने कहा, “मैं परिवर्तन यात्रा का प्रभारी होने के नाते यह सवाल जिम्मेदारी के साथ उठा रहा हूं। झीरम का सच केवल यह नहीं है कि हमला किसने किया। सच यह भी सामने आना चाहिए कि हमला होने की परिस्थितियां कैसे बनीं और सुरक्षा में कथित चूक के लिए कौन जिम्मेदार था।”

कांग्रेस ने दागे सीधे सवाल
राजेश तिवारी ने कहा कि 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए झीरम हमले में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं सहित 32 लोगों की हत्या हुई थी। इतनी बड़ी राजनीतिक घटना के बावजूद आज तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा में बदलाव क्यों हुआ, यात्रा का मार्ग किसने और क्यों बदलवाया तथा हमले की साजिश किसने तैयार की? उन्होंने सवाल उठाया कि हमले के दौरान घायल और जीवित बचे प्रत्यक्षदर्शियों में से कितने लोगों के बयान एनआईए ने लिए? कई बार प्रभावित लोग जांच एजेंसियों के सामने शपथ-पत्र के साथ उपस्थित हुए, लेकिन उनके बयानों को जांच में किस हद तक शामिल किया गया?

तिवारी ने यह भी सवाल किया कि हत्याकांड के बाद शहीदों और घायलों के पर्स, फाइलें और महत्वपूर्ण दस्तावेज घटनास्थल पर बिखरे पड़े रहे तथा मोबाइल सहित अन्य महत्वपूर्ण सामग्री को लेकर जांच में क्या कार्रवाई की गई? उन्होंने कहा कि इन सभी सवालों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।


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“बड़े नक्सली नेताओं के नाम चार्जशीट से क्यों हटाए गए?”
तिवारी ने आरोप लगाया कि एनआईए की शुरुआती एफआईआर में प्रमुख नक्सली नेताओं गणपति और रमन्ना के नाम थे, लेकिन बाद में आरोप-पत्र से उनके नाम हटा दिए गए। उन्होंने पूछा, “जब शुरुआत में इन बड़े नक्सली नेताओं के नाम झीरम प्रकरण में शामिल थे, तो बाद में किस आधार पर उनके नाम हटाए गए? क्या उनसे पूछताछ की गई? अगर जांच में उन्हें जिम्मेदार नहीं माना गया तो उसके आधार और तथ्य क्या थे?” तिवारी ने कहा कि इतनी बड़ी घटना बिना बड़े नक्सली नेतृत्व की जानकारी अथवा भूमिका के कैसे संभव हुई, यह भी जांच का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए था।

“सरेंडर करने वाले नक्सलियों से झीरम का सच क्यों नहीं पूछा गया?”
राजेश तिवारी ने कहा कि झीरम मामले में एनआईए द्वारा वांछित और फरार घोषित किए गए कई नक्सलियों ने बाद में अलग-अलग समय पर पुलिस एवं सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण किया। ऐसे में सरकार और जांच एजेंसी को स्पष्ट करना चाहिए कि उनसे झीरम घाटी हमले और उसकी साजिश के संबंध में कब और कितनी पूछताछ की गई? उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में भी बड़े और इनामी नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। यदि इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें झीरम प्रकरण की जानकारी हो सकती है, तो उनसे इस घटना के संबंध में क्या तथ्य जुटाए गए, यह जनता के सामने आना चाहिए। तिवारी ने आरोप लगाया, “एक तरफ सरकार नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी सफलता और बड़े नक्सलियों के आत्मसमर्पण का दावा करती है, दूसरी तरफ झीरम की साजिश का सच जानने के लिए उन्हीं लोगों से गंभीर पूछताछ हुई या नहीं, इसका जवाब सामने नहीं आता।”


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एसआईटी की जांच क्यों नहीं बढ़ने दी गई?
राजेश तिवारी ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने झीरम की सच्चाई सामने लाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ पुलिस की एसआईटी गठित की थी, लेकिन उसकी जांच आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने आरोप लगाया कि एनआईए ने एसआईटी को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए और मामला न्यायालय तक पहुंचा।
उन्होंने कहा, “हमारा सवाल बिल्कुल साफ है—अगर भाजपा सरकार को झीरम का पूरा सच सामने आने से डर नहीं है, तो फिर घटना के हर पहलू की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से परहेज क्यों? सुरक्षा व्यवस्था से लेकर मार्ग परिवर्तन और साजिश तक, हर सवाल का जवाब छत्तीसगढ़ की जनता को मिलना चाहिए।”

“झीरम के शहीदों को आधा नहीं, पूरा न्याय चाहिए”
राजेश तिवारी ने कहा कि झीरम घाटी में कांग्रेस ने अपने शीर्ष नेतृत्व को खोया था। यह केवल कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक है। उन्होंने कहा, “अदालत का फैसला अपनी जगह है, लेकिन झीरम की साजिश का पर्दाफाश होना अभी बाकी है। 23 और 24 मई को जो सुरक्षा थी, 25 मई को उसमें बदलाव क्यों हुआ? रास्ता क्यों बदला? बड़े नक्सली नेताओं के नाम क्यों हटे? आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों से क्या पूछताछ हुई? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि झीरम का पूरा सच सामने आ गया है।”

तिवारी ने कहा कि कांग्रेस झीरम के शहीदों और उनके परिवारों को “आधा-अधूरा नहीं, पूरा न्याय” दिलाने तथा घटना के पीछे की पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेगी।

पत्रकार वार्ता के दौरान जिला कांग्रेस कमेटी कांकेर के अध्यक्ष बसंत यादव प्रदेश सचिव जनक नन्दन कश्यप, प्रदेश सचिव आदिवासी कांग्रेस सरजू शोरी पूर्व महामंत्री पुरुषोत्तम पाटिल, महामंत्री उदय प्रकाश शर्मा बंटी, ब्लॉक अध्यक्ष यासीन करानी, ज्ञानेश चौहान, गफ्फार मेमन, भौम सिंह नाग, पुरुषोत्तम सिन्हा, एवं अन्य कांग्रेस कार्यकर्ता प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।