जनरल बोगी का सच-गिरीश पंकज

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ट्रेन की जनरल बोगी का सफर केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज के मानस को समझने की एक खुली प्रयोगशाला भी है। इस बोगी में कदम रखते ही आपको जो पहला दृश्य दिखाई देता है, वह हमारे तथाकथित सभ्य समाज की उस कड़वी हकीकत को बयां करता है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। खिड़की से हाथ डालकर, रुमाल या तौलिया फेंककर सीट पर कब्जा करने की जद्दोजहद में लगा इंसान जैसे ही खुद एक सुरक्षित जगह पा लेता है, उसका पूरा चरित्र बदल जाता है। एक बार सीट मिल जाने के बाद वही व्यक्ति, जो कुछ मिनट पहले खुद एक-एक इंच जगह के लिए तरस रहा था, अपने सामने खड़े किसी अन्य मजबूर यात्री को बैठने की जगह देने से कतराने लगता है। वह अपनी नजरें चुरा लेता है, सो जाने का ढोंग करता है या अपनी पोटली और बैग को इस तरह फैला लेता है जैसे वह पूरी सीट का इकलौता मालिक हो। जनरल बोगी की यह प्रवृत्ति एक बेहद गंभीर सामाजिक बीमारी की ओर इशारा करती है। जब तक कोई रेल पुलिस (जीआरपी) का जवान हाथ में डंडा लिए कड़क स्वर में न डांटे, तब तक कोई भी अपनी सीट से खिसकने को तैयार नहीं होता। जैसे ही पुलिस वाले की घुड़की पड़ती है, तीन लोगों की सीट पर पांच लोग हँसते-हँसते सिमट जाते हैं। यह स्थिति बताती है कि आज हमारे समाज में ‘स्वेच्छा से करुणाÓ खत्म हो चुकी है और उसकी जगह ‘भय से उपजी औपचारिकताÓ ने ले ली है। हम किसी की तकलीफ देखकर नहीं पिघलते, हम केवल कानून या डंडे के खौफ से झुकते हैं। यह एक संवेदनशील समाज के लक्षण कतई नहीं हैं। यह मानसिकता केवल ट्रेन के डिब्बे तक सीमित नहीं है। यह हमारे समकालीन समाज का एक छोटा सा रूप (माइक्रोकॉस्म) है। हम आज एक ऐसा समाज विकसित कर रहे हैं जहां शिक्षा, तकनीक और आर्थिक समृद्धि तो बढ़ रही है, लेकिन मानवीय करुणा का ग्राफ तेजी से नीचे गिर रहा है। लोग केवल अपने और अपने परिवार के स्वार्थ तक सिमट कर रह गए हैं। किसी बुजुर्ग की कांपती टांगें, किसी मां की गोद में बिलखता बच्चा या किसी बीमार व्यक्ति की बेबसी भी आज के इंसान को विचलित नहीं करती। लोग अपनी आंखें और कान बंद करके इस तरह बैठ जाते हैं मानो उनके अलावा इस दुनिया में किसी और का कोई अस्तित्व ही न हो। हम लोग भौतिक दृष्टि से विकसित होने का दंभ तो भरते हैं, लेकिन यदि उस विकास में दूसरे की तकलीफ को समझने का ‘सरोकारÓ ही गायब हो जाए, तो वह विकास असल में एक नैतिक पतन है। ट्रेन की उस बोगी में दिखने वाला स्वार्थ दरअसल इस बात का प्रतीक है कि जब संसाधन कम और भीड़ ज्यादा हो, तो इंसान अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर उतर आता है। लेकिन मनुष्य और पशु में यही तो अंतर है कि मनुष्य अपनी असुविधा में भी दूसरे की सुविधा का ध्यान रख सकता है। यदि हम एक ऐसा समाज बना रहे हैं, जहां सिर्फ ‘योग्यतम की उत्तरजीविताÓ का नियम लागू हो और कमजोरों के लिए कोई जगह न हो, तो हमें रुककर सोचना होगा। आज सामने खड़ा व्यक्ति परेशान है और हम सीट पर काबिज हैं; कल परिस्थितियां बदल सकती हैं, कल हम खड़े हो सकते हैं और कोई और हमारी बेबसी पर मुस्कुरा सकता है। जनरल बोगी की उस भीड़ में अगर एक व्यक्ति भी बिना किसी पुलिसिया रौब के, खुद थोड़ा सा सिमटकर किसी अजनबी को बैठने का सहारा दे देता है, तो लगता है कि इंसानियत अभी बची हुई है। समाज कानूनों या पुलिस के डंडे से केवल अनुशासित हो सकता है, लेकिन सभ्य और संवेदनशील केवल करुणा से ही बन सकता है। हमें अपने बच्चों को सिर्फ सफल होना नहीं, बल्कि संवेदनशील होना भी सिखाना होगा, वरना हम आलीशान गाडिय़ों और आधुनिक शहरों में रहने वाले पत्थरों का एक समाज बनकर रह जाएंगे।