अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ‘जेनरेशन ज़ी’ या जेन-ज़ी की प्रगतिशील सोच किसी भी समाज के जीवंत होने का प्रमाण है। व्यवस्था पर सवाल उठाना, अधिकारों के प्रति सजग रहना और रूढिय़ों को तोडऩा इस पीढ़ी की पहचान माना जाता है। लेकिन जब आधुनिकता की आड़ में राष्ट्र की अखंडता और सीमाओं की रक्षा करने वाली सेना का निराधार अपमान किया जाने लगे, तो यह बौद्धिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि गंभीर गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार बन जाता है। ‘जेन-ज़ी’ होने का दावा करके यह कहना कि सुरक्षा बल कश्मीर में स्थानीय नागरिकों या पर्यटकों को परेशान करते हैं, न केवल जमीनी हकीकत से अनभिज्ञता है, बल्कि वर्दी के प्रति किया जाने वाला अक्षम्य आक्षेप है। ?कश्मीर कोई सामान्य पर्यटन स्थल मात्र नहीं है; यह दशकों से सीमा पार आतंकवाद, अलगाववाद और छद्म युद्ध की मार झेल रहा एक संवेदनशील सीमांत क्षेत्र है। ऐसे भूगोल में सुरक्षा बलों की मौजूदगी किसी को तंग करने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों की जीवन रक्षा के लिए है।चेकपोस्ट, वाहनों की तलाशी और पहचान पत्र की जांच कोई व्यक्तिगत उत्पीडऩ नहीं, बल्कि सुरक्षा रणनीति का अनिवार्य हिस्सा हैं ताकि किसी आतंकी साजिश को समय रहते विफल किया जा सके। आज यदि लाखों पर्यटक बिना किसी भय के गुलमर्ग, पहलगाम और डल झील की वादियों का आनंद ले रहे हैं, तो इसके पीछे दिन-रात मुस्तैद सुरक्षा बलों की निगरानी है। शून्य से नीचे के तापमान, पथराव के जोखिम और निरंतर जानलेवा खतरों के बीच ड्यूटी करने वाले जवानों की सतर्कता को ’परेशान करना’ कहना सुरक्षा की बुनियादी समझ का अभाव दर्शाता है। जो लोग सेना पर स्थानीय लोगों को प्रताडि़त करने का आरोप लगाते हैं, वे प्राय: घाटी में सेना के कल्याणकारी कार्यों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं। एक लडक़ी की बदतमीजी पिछले दिनों वायरल हुई। वह सेना का अपमान करते हुए चीख रही थी कि मैं जेन -ज़ी हूँ, अजीब बात है, जेन ज़ी होने का यह मतलब नहीं कि वह लडक़ी सेना का अपमान करे। भारतीय सेना का संबंध केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि स्थानीय समाज को सशक्त करने से भी है। सेना ने घाटी के सुदूर क्षेत्रों में ‘आर्मी गुडविल स्कूल’ स्थापित किए हैं, जहाँ हजारों कश्मीरी युवाओं को आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही है। 2014 की भीषण कश्मीर बाढ़ हो, हिमस्खलन हो या भारी बर्फबारी में फंसे स्थानीय निवासी और पर्यटक, सेना ने हमेशा अपनी जान दांव पर लगाकर आम जनता को सुरक्षित निकाला है। दूरदराज के गांवों में मुफ्त मेडिकल कैंप लगाना, स्थानीय युवाओं को खेल और कौशल विकास के अवसर देना सेना के नियमित अभियानों का हिस्सा है। डिजिटल युग में पश्चिमी ’एंटी-एस्टेब्लिशमेंट’ यानी व्यवस्था विरोधी संस्कृति की सतही नकल करना कई बार युवाओं के लिए आधुनिक दिखने का जरिया बन जाता है। 30 सेकंड की वीडियो रील या बिना संदर्भ की सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर सुरक्षा बलों को खलनायक के रूप में पेश करना परिपक्वता का लक्षण नहीं है। वैसे अपने आप को जेन-ज़ी कहने वाली लडक़ी किसी कोण से जेन ज़ी लग नहीं रही थी. अगर थी भी तो उसे पता होना चाहिए कि वह किसका अपमान कर रही थी । अधिकारों की बात करते समय कर्तव्यों और देश की सुरक्षा प्राथमिकताओं को भूल जाना बौद्धिक दिवालियापन है। जब तक कोई व्यक्ति उन परिस्थितियों का सामना नहीं करता जिनमें एक जवान 24 घंटे अपनी जान हथेली पर रखकर गश्त करता है, तब तक वातानुकूलित कमरों में बैठकर सेना पर आक्षेप लगाना केवल संवेदनहीनता को दर्शाता है। देश के विभिन्न कोनों से आए जवानों के लिए राष्ट्र का सम्मान और नागरिकों का विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत होता है। जब देश के भीतर से ही कुछ लोग बिना किसी साक्ष्य के सुरक्षा बलों के चरित्र पर सवाल उठाते हैं, तो यह सीधे तौर पर सीमा पर खड़े सैनिक के मनोबल पर प्रहार करता है। सेना की निष्पक्षता और मानवाधिकारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता वैश्विक स्तर पर प्रमाणित है, और किसी भी व्यक्तिगत चूक पर सेना का अपना आंतरिक कानून अत्यंत कठोरता से कार्रवाई करता है। प्रगतिशीलता का वास्तविक अर्थ संस्थानों का अंधा विरोध करना नहीं, बल्कि उनकी जटिलताओं और उनके त्याग को गहराई से समझना है। आलोचना और अपमान के बीच एक बहुत स्पष्ट रेखा होती है। ‘जेन-ज़ी’ को अपनी तार्किक क्षमता का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा की वास्तविकताओं को समझने में करना चाहिए; क्योंकि सेना का सम्मान किसी पीढ़ीगत पसंद या ट्रेंड का विषय नहीं, बल्कि देश के प्रति एक नागरिक का मूलभूत धर्म है।
जेन -ज़ी का मतलब!!- गिरीश पंकज
Follow Us
