रायपुर। एशियन गेम्स 2026 में छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। प्रदेश की बेटी संजू देवी भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ स्वर्ण पदक जीतकर लौटीं, तो जशपुर के धावक अनिमेष कुजूर ने 4×100 मीटर मिश्रित रिले में कांस्य पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। अनिमेष की टीम ने पदक के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी अपने नाम किया।
इन दोनों खिलाड़ियों की कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि इनके सफर की शुरुआत किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम से नहीं हुई। एक खिलाड़ी कोरबा के गांव से निकलकर कबड्डी के मैट तक पहुंची, तो दूसरे ने जशपुर के एक सुदूर गांव से निकलकर एथलेटिक्स ट्रैक पर अपनी जगह बनाई।
कोरबा से एशियन गेम्स के गोल्ड तक ऐसा रहा संजू देवी का सफर
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के केरा कछार की रहने वाली संजू देवी भारतीय महिला कबड्डी टीम का हिस्सा बनीं। बचपन से ही गांव और आसपास के इलाकों में कबड्डी का माहौल देखने वाली संजू की इस खेल में दिलचस्पी बढ़ती गई। हालांकि शुरुआत में उन्होंने कबड्डी को गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन 12वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई के साथ खेल की तैयारी पर भी ध्यान देना शुरू किया।
परिवार की आर्थिक स्थिति सीमित होने के बावजूद संजू ने खेल नहीं छोड़ा। उनके पिता पेंटिंग और ठेकेदारी से जुड़े काम करते हैं, जबकि मां गृहिणी हैं। परिवार के पास थोड़ी खेती भी है। सीमित संसाधनों के बीच माता-पिता ने बेटी के खेल को आगे बढ़ाने में सहयोग किया।
जिला कबड्डी संघ से ली अपनी शुरुआती ट्रेनिंग
संजू ने कोरबा जिला कबड्डी संघ से अपनी शुरुआती ट्रेनिंग ली। इसके बाद बहतरा स्टेडियम में उन्हें बेहतर प्रशिक्षण के साथ डाइट और फिजियो जैसी सुविधाएं मिलीं। लगातार अभ्यास के साथ उनके खेल में निखार आता गया और वह राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगीं।
संजू के करियर में चोट ने भी मुश्किल खड़ी की। एक टूर्नामेंट के दौरान चोट लगने के बाद उन्हें सर्जरी करानी पड़ी। इसके बाद फिजियो, डाइट और फिटनेस पर काम करते हुए उन्होंने दोबारा मैदान पर वापसी की। भारतीय टीम के कैंप में उन्हें कोचिंग, न्यूट्रिशन और फिटनेस की बेहतर सुविधाओं के साथ तैयारी का मौका मिला। इससे उनका खेल और मजबूत हुआ।
एशियन गेम्स के फाइनल में भारतीय महिला कबड्डी टीम ने ईरान को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। टीम में रेडर के तौर पर संजू की भूमिका भी अहम रही। इस गोल्ड के साथ उनके करियर में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई। इससे पहले वह भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ विश्व कप में भी खेल चुकी हैं।
गोल्ड जीतकर लौटीं तो मुख्यमंत्री ने किया सम्मान

संजू के लिए यह सम्मान केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धि का पुरस्कार नहीं है। उनके प्रदर्शन ने कोरबा और छत्तीसगढ़ के उन युवा खिलाड़ियों को भी उम्मीद दी है, जो सीमित संसाधनों के बीच खेल को अपना करियर बनाने का सपना देख रहे हैं।
जशपुर के अनिमेष ने ट्रैक पर रचा इतिहास
छत्तीसगढ़ की दूसरी बड़ी उपलब्धि एथलेटिक्स में आई। जशपुर जिले के घुइतांगर गांव से निकले अनिमेष कुजूर ने 4×100 मीटर मिश्रित रिले में भारतीय टीम के साथ कांस्य पदक जीता।
भारतीय चौकड़ी में गुरिंदरवीर सिंह, स्नेहा शानुवाली, अनिमेष कुजूर और हरिता भद्रा शामिल थे। टीम ने फाइनल में 41.06 सेकंड का समय निकाला और तीसरे स्थान पर रहते हुए कांस्य पदक हासिल किया। इस प्रदर्शन के साथ भारतीय टीम ने 41.35 सेकंड के पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया। चीन ने 40.78 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण और थाईलैंड ने 40.87 सेकंड के साथ रजत पदक जीता। भारत का समय 41.06 सेकंड रहा।
बारिश में फिसले, लेकिन दौड़ नहीं रुकी
अनिमेष की एशियन गेम्स की कहानी सिर्फ पदक तक सीमित नहीं है। सेमीफाइनल हीट के दौरान बारिश के कारण ट्रैक गीला था। बैटन बदलते समय उनका पैर फिसल गया। ऐसे समय में रेस का संतुलन बिगड़ना पूरी टीम के लिए भारी पड़ सकता था, लेकिन अनिमेष ने खुद को संभाला और दौड़ जारी रखी।
यही जज्बा फाइनल में भी नजर आया। भारतीय चौकड़ी ने तालमेल के साथ दौड़ पूरी की और पोडियम पर जगह बनाई। बारिश से प्रभावित फाइनल में टीम ने सीजन का शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम किया।
सैनिक स्कूल से स्प्रिंट ट्रैक तक तय किया सफर
अनिमेष का जन्म 2 जून 2003 को हुआ। उनका परिवार भी खेल से जुड़ा रहा है। उनकी मां हॉकी खिलाड़ी रही हैं, जबकि पिता एथलीट और फुटबॉलर रहे हैं तथा छत्तीसगढ़ पुलिस में कार्यरत हैं।
अंबिकापुर सैनिक स्कूल में पढ़ाई के दौरान अनिमेष का सपना भारतीय सेना में जाने का था। कोरोना काल में फिटनेस बनाए रखने के लिए उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू किया। इसी दौरान दोस्तों के कहने पर स्थानीय दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। उनकी रफ्तार ने ध्यान खींचा और यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।
फुटबॉल से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे उन्हें स्प्रिंटिंग की दुनिया में ले गया। इसके बाद उन्होंने एथलेटिक्स को गंभीरता से अपनाया और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
लंबाई को कमजोरी नहीं, ताकत बनाया
करीब 1.88 मीटर लंबे अनिमेष के लिए शुरुआती दौर में शरीर का लचीलापन और रनिंग तकनीक चुनौती रहे। लेकिन उन्होंने इन्हीं कमियों पर काम किया और अपनी लंबाई को ट्रैक पर फायदा बनाने की कोशिश की।
ओडिशा के रिलायंस फाउंडेशन एथलेटिक्स हाई परफॉर्मेंस सेंटर में कोच मार्टिन ओवेंस के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी तकनीक और स्पीड पर काम किया। प्रशिक्षण के साथ उनके प्रदर्शन में लगातार सुधार आया और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में पदक उनके खाते में जुड़ते गए।
राष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार शानदार प्रदर्शन
एशियन गेम्स का कांस्य अनिमेष की उपलब्धियों की पहली बड़ी कहानी नहीं है। इससे पहले भी उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी क्षमता साबित की है।
यू-23 राष्ट्रीय एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 200 मीटर में स्वर्ण पदक जीता। सीनियर फेडरेशन कप में 200 मीटर दौड़ 20.40 सेकंड में पूरी कर स्वर्ण के साथ मीट रिकॉर्ड बनाया। 100 मीटर में उन्होंने 10.15 सेकंड का समय निकालकर रजत पदक हासिल किया।
ग्रीस की ड्रामिया इंटरनेशनल स्प्रिंट मीट में भी अनिमेष ने 10.18 सेकंड के प्रदर्शन के साथ कांस्य पदक जीता। उनका प्रदर्शन एशियन गेम्स में भी केवल रिले तक सीमित नहीं रहा। वह व्यक्तिगत स्पर्धाओं में भी भारतीय एथलेटिक्स दल का हिस्सा रहे और 100 मीटर तथा 200 मीटर में प्रतिस्पर्धा की।
संजू देवी की स्वर्णिम कामयाबी और अनिमेष कुजूर का रिकॉर्ड के साथ कांस्य इस बात का संकेत है कि प्रदेश में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जरूरत है तो उन्हें सही प्रशिक्षण, सुविधाएं और लगातार अवसर देने की। एशियन गेम्स के पोडियम पर छत्तीसगढ़ के इन खिलाड़ियों की मौजूदगी ने प्रदेश के खेल मानचित्र पर एक और मजबूत निशान छोड़ दिया है। अब इन उपलब्धियों से आगे की चुनौती यह होगी कि गांव-कस्बों से निकलने वाली अगली पीढ़ी को भी ऐसी ही उड़ान के लिए मजबूत मंच मिले।


