किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आत्मा उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की शक्ति में निहित होती है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह नीतियों, व्यवस्थागत कमियों या प्रशासनिक विफलताओं के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर सके। लेकिन ध्यान रहे तो आंदोलन कर रहे हैं, वे इस देश के ही बच्चे हैं। उन पर निर्ममतापूर्वक लाठी प्रहार नहीं होना चाहिए. आंदोलनकारियों को भी हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए। रास्ता गांधीवादी ही रहे। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी ‘नीटÓ जैसी बड़ी और देश के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी परीक्षा में कथित अनियमितताओं या गड़बडिय़ों पर देशव्यापी आक्रोश स्वाभाविक भी है और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से आवश्यक भी। यदि व्यवस्था में त्रुटि है, तो उस पर सवाल उठना, सुधार की मांग करना और जिम्मेदार मंत्रियों या अधिकारियों की जवाबदेही तय करना नागरिक सजगता का प्रमाण है। परंतु, समस्या तब उत्पन्न होती है जब असहमति की इस पवित्र भावना और न्याय की जायज मांग को कुछ अराजक तत्व अपने संकीर्ण राजनीतिक अथवा देश-विरोधी एजेंडे के लिए एक ढाल की तरह उपयोग करने लगते हैं। हाल के दिनों में विभिन्न आंदोलनों की आड़ में जो दृश्य, शब्दावली और हिंसक प्रवृत्तियां देखने को मिली हैं, वे न केवल चिंताजनक हैं बल्कि इस बात पर गंभीर चिंतन की मांग करती हैं कि ‘विरोध के अधिकारÓ और ‘अराजकताÓ के बीच की जो बारीक रेखा है, वह कहीं पूरी तरह मिट तो नहीं रही है। जैसे कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर का आंदोलन देखते-ही-देखते कितना अराजक और हिंसक हो गया। किसी भी विमर्श की गुणवत्ता उसमें प्रयोग की जाने वाली भाषा से तय होती है। जंतर मंतर के मंच से यह पूछा जाए कि ‘भारत माता का बाप कौन है?Ó तो यह केवल एक अनर्गल बयान नहीं रह जाता, बल्कि यह उस देश की अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान पर एक सीधा और आघातकारी प्रहार है जिसने सदियों से अपनी भूमि को माता मानकर शीश नवाया है। ‘भारत माताÓ कोई भौगोलिक सीमा मात्र नहीं है; यह इस देश के सामूहिक गौरव, इतिहास और करोड़ों नागरिकों की आस्था का प्रतीक है। ऐसी ओछी शब्दावली का प्रयोग राष्ट्र के प्रति किसी प्रेम या संवेदनशीलता को नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक दिवालियापन और द्वेष को दर्शाता है। इसी प्रकार, भारत के सांस्कृतिक नायकों और प्रतीकों को नीचा दिखाने का प्रयास भी इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को मात्र ‘सीता का पतिÓ कहकर एक संकुचित दायरे में समेटने की कोशिश, उस गहरे सांस्कृतिक जुड़ाव को कमजोर करने का प्रयास है जो इस देश को एक सूत्र में पिरोता है। यह भाषा किसी परीक्षा सुधार या छात्रों के न्याय की लड़ाई से मेल नहीं खाती। यह शब्दावली यह संकेत देती है कि आंदोलन का मंच अब वास्तविक पीडि़तों के हाथ से निकलकर उन तत्वों के हाथ में जा चुका है जिनका उद्देश्य व्यवस्था सुधार नहीं, बल्कि देश के सांस्कृतिक ढाँचे को विखंडित करना है। जब आंदोलनों के मंचों से यह धमकी दी जाए कि ‘भारत को नेपाल बना देंगेÓ या ‘संसद में घुसकर प्रधानमंत्री को पीटेंगेÓ, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे से बहुत बाहर निकलकर देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए एक सीधी चुनौती बन जाती है। देश के प्रधानमंत्री किसी दल विशेष के नेता होने के साथ-साथ लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के प्रधान और राष्ट्र के प्रतिनिधि होते हैं। उनके खिलाफ ऐसी हिंसक भाषा का प्रयोग संसद, संविधान और उस जनता के विवेक का अपमान है जिसने उन्हें चुनकर भेजा है। भारत एक संप्रभु राष्ट्र है जिसकी अपनी एक अनूठी पहचान, विशालता और संवैधानिक गरिमा है. उसकी रक्षा होनी चाहिए।
आंदोलन, हिंसा, लाठीचार्ज!-गिरीश पंकज
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