आवत हिय हरषै नहीं-डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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गोस्वामी तुलसीदास का एक प्रसिद्ध दोहा है – आवत हिय हरषै नहीं,नैनन नहीं सनेह। तुलसी वहां न जाइए , कंचन बरसे मेह ।। अर्थात आपके आने से जिस स्थान या घर में लोगों के हृदय में प्रसन्नता न हो एवं जिनकी आँखों में आपके लिए स्नेह न हो, उस जगह कभी नहीं जाना चाहिए, भले ही वहां कंचन की बारिश क्यों न हो रही हो।इस दोहे में आत्म- सम्मान और प्रेम के महत्व को धन से अधिक बताया गया है । आज बहुत से स्थानों पर लोग भीड़ बढ़ाने के लिए लोगों को आमंत्रित करते तो हैं लेकिन वहाँ जाने पर उनके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं मानो देखते ही उन्हें साँप सूँघ गया हो। चेहरे पर खुशी के बजाय उदासी एवं नकारात्मकता का भाव आ जाता है जिसे कोई भी समझदार आदमी आसानी से पढ़ सकता है। इसलिए ऐसे लोगों के आमंत्रण पर जिनकी आंखों में सच्चे प्रेम की जगह बनावटीपन एवं दिखावे की भावना दिखाई दे तो उनके घर या उत्सव में कभी भी नहीं जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो मनुष्य को अपना आत्मसम्मान खोकर कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। सच्चा मनुष्य कहलाने का वही अधिकारी होता है जो अपने जीवन में मूल्यों को बनाए रखता है, सबके साथ स्नेह, उदारता, सम्मान , परोपकार एवं मानवता के साथ व्यवहार करता है। यह शाश्वत सच है कि मूल्यों के बगैर मनुष्य और जानवर में कोई फ़र्क नहीं रह जाता। किसी कवि ने ठीक ही कहा है कि ‘यही पशु- प्रवृत्ति है कि सिफऱ् स्वयं ही चरे। वही श्रेष्ठ मनुष्य है ,जो मनुष्य के लिए मरे।Ó आज ये दृश्य अक्सर दिखाई देती है कि जब कोई किसी के घर आता है तो उस परिवार के लोगों के माथे पर सिकन पड़ जाती है। जबकि कहा गया है कि अतिथि देवो भव ।अतिथियों के संदर्भ में शास्त्रों में कहा गया है कि अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति देवाश्च सर्वे पितरोऽग्नयश्च। तस्मिन् द्विजे पूजिते पूजिता: स्युर्गते निराशा: पितरो व्रजन्ति॥ यानी जब कोई थका हुआ अतिथि घर आता है, तो देवता, पितर और अग्नि भी उसके पीछे- पीछे चलते हैं। उस अतिथि का सत्कार करने से इन सभी देवताओं की पूजा हो जाती है और यदि अतिथि निराश होकर लौटता है, तो वे देवता और पितर भी निराश हो जाते हैं। इसी तरह यह भी कहा गया है कि अतिथि: पूजितो यस्य ध्यायते मनसा शभम्। न तत् क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीशिण: अर्थात अतिथि का मानसिक सम्मान करना सौ वैदिक यज्ञों से भी बढ़कर है। स्वाभिमानी पुरूष स्वयं के आत्ममूल्य का जितना आदर करते हैं उतना ही दूसरों के आत्म स्वाभिमान का भी करते हैं। जबकि अहंकारी लोग केवल स्वयं का पूरा ध्यान रखते हैं लेकिन दूसरों को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। क्योंकि स्वाभिमान में सकारात्मकता होती है जबकि अहंकार नकारात्मकता। मनुष्य का पाला जीवनभर सत्कार, शिष्टाचार ,वास्तविकता एवं लोगों के दिखावे पड़ता है। यही चारों कारक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने एवं कमज़ोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जऱा भी कमी आने से दरार पैदा होने में वक़्त नहीं लगता। इसलिए सदैव प्रेम, सम्मान,अनुशासन, विनम्रता एवं सहानुभूति की भावना से सभी के साथ व्यवहार करना चाहिए। जहाँ तक हो सके किसी के प्रति मन में कटुता, ईष्र्या, द्वेष एवं अहंकार की भावना नहीं आने देना चाहिए।