छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में फैला हुआ नक्सलवाद का हिंसक अंधेरा अब खत्म हो गया है। एक नया सूरज उग रहा है। विकास का.उसकी लालिमा अब धीरे-धीरे दिखाई पडऩे लगी है। कह सकते हैं कि विचारधारा का कोहरा छंट चुका है। माओवादियों ने आत्मसमर्पण करके हथियार डाले और अपने हाथ में भारतीय संविधान की प्रति ग्रहण की। इस तरह से यह एक बड़ा संदेश था कि वे सब भारत के लोकतंत्र पर विश्वास करते हैं। उस हिसाब से तो अब लग रहा था कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जो विश्वास व्यक्त किया, वह विश्वास समय से पहले ही फलीभूत हो गया है। उन्होंने कहा था कि मार्च 2026 तक नक्सलवाद का खत्म हो जाएगा, और केंद्रीय गृह मंत्री ने लोकसभा में 30 मार्च 2026 को अधिकृत रूप से घोषणा कर दी कि यह देश माओवाद से मुक्त हो गया है. 29 मार्च को ही आंध्र प्रदेश में कुख्यात माओवादी सुरेश ने अपने नौ साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया. वह पिछले 36 वर्षों से भूमिगत था. माहौल को देखकर अब लग तो रहा है कि समय से पहले ही नक्सलवाद विदा ले चुका है. भविष्य में अगर भूले-भटके कहीं कोई घटना होती है तो यही माना जाएगा कि तमाम चूहे मारे जा चुके हैं.लेकिन अभी भी इक्का दुक्का किसी बिल में छुपे हुए हैं। वे भी मारे ही जाएँगे. वैसे अब लगता तो है कि अब एक ऐसी विचारधारा पर विराम लग जाएगा, जिसने क्रांति का मतलब हिंसा समझ लिया था। यह अच्छी बात है कि धीरे-धीरे ही सही, अनेक नक्सलियों को यह बात अब समझ में आ गई कि हिंसा से कोई लंबी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। उल्टे अंतत: यह आत्मघाती कदम ही साबित होता है। न जाने कितने माओवादी मुठभेड़ में मार गिराए गए। लेकिन अब माओवादियों ने आत्म मंथन करना शुरू कर दिया है। इसी का सुपरिणाम है कि सैकड़ो माओवादी मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं। इसलिए बेहतर है कि मुख्यधारा में शामिल होकर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के साथ जीवनयापन किया जाए। यही कारण है कि आत्म समर्पित माओवादियों ने सरकार को अपनी बंदूकें सौंप कर हाथों में भारतीय संविधान की प्रति थाम ली। कहा जा रहा है कि अब नक्सलियों का नेतृत्व करने वाले इक्का-दुक्का कमांडर ही बचे हैं। उम्मीद है वे भी या तो आत्मसमर्पण कर देंगे या एक दिन मुठभेड़ में मारे जाएंगे। अब समय आ गया है कि कुछ आत्मसमर्पित नक्सली लोकतंत्र में विश्वास करते हुए आगामी विधा सभा चुनाव में प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ें और विकास की उनकी अवधारणा को पूरा करें. खून खराबा बहुत हो गया, अब प्यार मोहब्बत की बयार बहे. नेपाल में माओवादी चुनाव लड़ कर सत्ता में काबिज हुए. छत्तीसगढ़ में भी यह प्रयोग करके देखा जा सकता है. हो सकता है वर्तमान में अगर कहीं कोई कमी दिख रही हो, तो वह बाद में पूरी हो जाए. जो भी हो, अब एक नया छत्तीसगढ़ उभर रहा है, बस्तर की मैना अब उन्मुक्त हो कर गीत गा सकेगी. बस्तर को हम नई दृष्टि से देख सकेंगे. देश के लोग आएँगे. बस्तर का विकास होगा. प्रदेश खुशहाल होगा.केंद्र का भी अभिनन्दन इस बात के लिए कि जो कहा, वो कर दिखाया.
जो कहा वो कर दिखाया – गिरीश पंकज
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