जाति न पूछो साधु की-डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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जाति प्रथा का प्रकोप भारत का जनमानस सदियों से झेल कर रहा है जो आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आज भी कुछ लोग दान एवं भिक्षा जाति पूछकर ही किया करते हैं तथा सम्मान जाति को आधार मानकर करते हैं। जबकि शास्त्रानुसार सम्मान, दान एवं भिक्षा सुपात्र को ही देने का प्रावधान है न कि जाति विशेष के लोगों को। कहा भी गया है कि ‘शैले शैले न माणिक्य मौक्तिंकं न गजे गजे। साधवो हि न सर्वत्र चन्दनं न वने वनेÓ।। अर्थात यह श्लोक दुर्लभता, श्रेष्ठता और विशिष्टता का प्रतीक है। यह श्लोक यह बतलाता है कि जो चीजें जितनी मूल्यवान या श्रेष्ठ होती हैं, वे उतनी ही दुर्लभ होती हैं। जिस प्रकार उत्तम रत्न, सज्जन पुरुष और चंदन जैसी सुगंधित चीजें हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं, उसी प्रकार दुनिया में गुणवान लोग बहुत कम होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे हर पर्वत पर माणिक रत्न नहीं मिलता, हर हाथी में मोती नहीं होता। उसी प्रकार हर जगह सज्जन लोग और हर वन में चंदन के वृक्ष नहीं होते। अच्छे लोग सदैव सज्जन एवं बुद्धिमान व्यक्ति की अवहेलना नहीं करते। कहा गया है कि साधुन की निंदा बिना, नहीं नीच बिरमात। पियत सकल रस काग खल, बिनु मल नहीं अघात॥ अर्थात नीच व्यक्ति सज्जन पुरुष की निन्दा किए बिना संतुष्ट नहीं होते, जैसे दुष्ट कौवा सारे रसों का पान करने के बाद भी मल खाए बिना अघाता नहीं है। इसी संदर्भ में संत कबीरदास का एक बहुत ही प्रसिद्ध दोहा है जिसके माध्यम उन्होंने समाज में फैले जाति-पाति के भेदभाव को मिटाने और ज्ञान को सर्वोच्च महत्व देने का संदेश दिया है यथा-जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।। यानी हमें किसी भी साधु या ज्ञानी व्यक्ति की जाति या धर्म नहीं पूछना चाहिए। उनके ज्ञान और सद्गुणों का सम्मान करना चाहिए और उसे ही ग्रहण करना चाहिए। जिस प्रकार तलवार का असली मूल्य उसकी धार देखकर तय किया जाता है, न कि उसकी बाहरी सजावट या म्यान के आधार पर। ठीक उसी प्रकार, मनुष्य का महत्व उसके ज्ञान और गुणों से होता है, उसकी जाति से नहीं। कबीर ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक एवं धार्मिक रूढिय़ों, भ्रांतियों एवं मान्यताओं का अपनी वाणी से भरपूर विरोध किया था। सज्जन या साधु की पहचान कैसे करें के संदर्भ में भी उन्होंने लिखा है कि ‘साधु ऐसा चाहिए, जैसे सूप सुपाय, सार सार को गाहि रहे ,थोथा देई उड़ायÓ। मतलब साधु या सज्जन पुरुष सूप के समान ही होना चाहिए जो सार-सार अर्थात अन्न को बचा कर रखे और थोथा या कचरे को हवा के साथ उड़ा दे। सूप किस पदार्थ का बना है यह महत्वपूर्ण नहीं है। यही साधु या सज्जन की पहचान होती है। यहां आमतौर पर साधु का मतलब किसी संन्यासी अथवा भिक्षुक से ही माना जाता है किन्तु कबीर का दोहा सज्जन व्यक्ति की महत्ता को दर्शाता है। इंसान के व्यक्तित्व एवं व्यवहार एवं जीवन के वास्तविक मूल्यों को समझाने के लिए कबीर ने कहा है कि धिणा जिस दिन परखिए, मंदा होए घास। तबहीं जानिए, कौन कितना जास। इस दोहे का अर्थ है कि जब किसी व्यक्ति या वस्तु की परख करनी हो, तो उसे कठिनाई या विपत्ति के समय में परखना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे सूखा पडऩे पर घास मुरझा जाती है। भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार तथा असमानता को सामाजिक बुराई के अंतर्गत गिना जाता है। प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार भारत में जातियों को चार श्रेणियों में बाँटा गया है- सामान्य वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति। सन 1976 में भारतीय संविधान में हुए 42 वें संशोधन के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है यहाँ सभी धर्मों को समान सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता एवं समान अधिकार प्राप्त है। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य नागरिकों के बीच समरसता कामय रखना एवं छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करना है। संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार एवं सभी को अपनी आस्था के अनुसार शांतिपूर्ण ढंग से जीवन जीने का अधिकार दिया गया है। देश में आपसी सद्भाव एवं एकता कायम करने के लिए ज़रूरी है कि हम जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर परस्पर प्रेम, संवाद तथा एक-दूसरे के अधिकारों का दिल से सम्मान करें।