1. जब आप ‘हक़’ की कहानी को देखते हैं, तो आपको क्या लगता है कि दर्शकों को इससे क्या मिलेगा?
आखिरकार, जब आप दो घंटे की फिल्म बना रहे होते हैं, तो कहानी को कुछ खास पहलुओं तक सीमित करना पड़ता है, ताकि उसका ड्रामा और इमोशन दर्शकों तक सही तरह पहुँचे। इस केस के कई पहलू रहे हैं, लेकिन ‘हक़’ में हमने इन दो लोगों के बीच की इंसानी और इमोशनल कहानी पर फोकस किया है। यह एक ऐसी शादी है, जो एक खूबसूरत हनीमून फेज़ से शुरू होती है, फिर इसमें अच्छे और बुरे दौर आते हैं, रिश्ता मुश्किल दौर से गुजरता है और आखिरकार उस मोड़ पर पहुँचता है, जो हमेशा मुश्किल होता है- तलाक।
मेरे लिए यह फिल्म असल में दो टूटे हुए लोगों की कहानी है। इस निजी कहानी के साथ एक बड़ा टकराव भी है- एक आदमी उस चीज़ के लिए लड़ रहा है, जिस पर उसका गहरा विश्वास है, वहीं एक महिला अपने गुज़ारे और सम्मान जैसे बुनियादी हक़ के लिए लड़ रही है। हमने इन पहलुओं को फिल्म में किस तरह दिखाया है, इसके बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं बताना चाहता। लेकिन, जब आपके पास कहानी कहने के लिए सिर्फ दो घंटे होते हैं, तो आपको उसे एक ऐसी कहानी में समेटना पड़ता है, जो दर्शकों को एक मजबूत इमोशनल अनुभव दे। मेरे लिए ‘हक़’ आखिरकार इसी इमोशनल अनुभव के बारे में है।
2. ऐसे किरदार को निभाना कैसा रहा, जिसकी सोच और दुनिया को देखने का नज़रिया आपसे बिल्कुल अलग है? क्या उसके नज़रिए को समझने की कोशिश ने आपको भी उसे अलग तरह से समझने में मदद की?
एक एक्टर के तौर पर कुछ सबसे दिलचस्प किरदार वही होते हैं, जो आपकी अपनी सोच और नज़रिए से बिल्कुल अलग हों। कभी-कभी आप ऐसे किरदार निभाते हैं, जिनकी सोच आपसे काफी मिलती-जुलती होती है, लेकिन ऐसे इंसान के दिमाग को समझने में एक अलग ही रोमांच होता है, जिसे आप शुरुआत में पूरी तरह समझ नहीं पाते।
जब आप स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, उसे दोबारा पढ़ते हैं और फिर उन पलों को असल में जीना और उन्हें इमोशन के साथ निभाना शुरू करते हैं, तो धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि किरदार ऐसा क्यों सोचता है। आप उसकी अपनी सच्चाई को समझने लगते हैं, भले ही वो आपकी सोच से कितनी भी अलग क्यों न हो।
मुझे लगता है कि एक्टिंग को दिलचस्प बनाने वाली यही बात है। आपको ऐसे नज़रियों को समझने का मौका मिलता है, जिन्हें शायद आपने पहले कभी नहीं समझा था। अगर आप अपने जैसे ही किसी किरदार को निभा रहे हैं, तो उसमें एक तरह की पहचान होती है। लेकिन जब आप ऐसे किरदार को निभाते हैं, जिसकी सोच आपकी अपनी समझ को चुनौती देती है, तो असली चुनौती वहीं होती है। और इसी दौरान आप अपने बारे में भी कुछ नया सीखते हैं। मेरे लिए ऐसे किरदार को निभाने से मिलने वाला यही असली जागना है।
3. ‘हक़’ अब एंड पिक्चर्स पर प्रीमियर हो रही है। दर्शकों को इस फिल्म को टेलीविज़न पर देखने का मौका मिलने को लेकर आप कितने उत्साहित हैं?
मैं बहुत उत्साहित हूँ कि 20 सितंबर को रात 8 बजे एंड पिक्चर्स के ज़रिए ‘हक़’ और भी बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचेगी। यह ऐसी कहानी है, जिसे देखा जाना चाहिए और जिस पर बात भी होनी चाहिए। मुझे खुशी है कि जो दर्शक इसे सिनेमाघरों में नहीं देख पाए, उन्हें अब अपने घर के आराम से यह फिल्म देखने का मौका मिलेगा। मुझे उम्मीद है कि यह फिल्म दर्शकों से जुड़ पाएगी, उनके बीच बातचीत शुरू करेगी और फिल्म देखने के काफी समय बाद तक उनके साथ बनी रहेगी।
