नई दिल्ली। भारत और श्रीलंका के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग अब महज द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं रहा है। इसका सीधा असर हिंद महासागर की क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत की समुद्री रणनीति पर पड़ रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की श्रीलंका यात्रा इसी रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने की अहम कड़ी मानी जा रही है।
भारत की सुरक्षा को लेकर श्रीलंका का बड़ा भरोसा
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने स्पष्ट किया है कि श्रीलंका की जमीन का इस्तेमाल भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ किसी भी गतिविधि के लिए नहीं होने दिया जाएगा। हिंद महासागर में श्रीलंका की बेहद अहम भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह आश्वासन भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक संदेश है।
श्रीलंका प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों के करीब स्थित है। कोलंबो, हंबनटोटा और आसपास का समुद्री क्षेत्र भारत की समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। ऐसे में हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच भारत के लिए श्रीलंका के साथ मजबूत और भरोसेमंद सुरक्षा साझेदारी रणनीतिक जरूरत बन गई है।
एयर डिफेंस से मिलिट्री ट्रेनिंग तक बढ़ा सहयोग
भारत-श्रीलंका रक्षा सहयोग अब सैन्य उपकरणों तक सीमित नहीं है। श्रीलंका की 6 L70 एयर डिफेंस गनों का अपग्रेडेशन, दोनों देशों के नेशनल डिफेंस कॉलेजों के बीच सहयोग और NCC यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम इस साझेदारी के विस्तार को दर्शाते हैं।
L70 गनों के अपग्रेडेशन से श्रीलंका की महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की वायु रक्षा क्षमता मजबूत होगी। वहीं, सैन्य संस्थानों और युवा कैडेट्स के बीच बढ़ता संपर्क दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक विश्वास को मजबूत करेगा।
आपदा के समय ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ भारत
चक्रवात ‘दितवाह’ के दौरान भारत की राहत और पुनर्वास सहायता ने भी दोनों देशों की साझेदारी को नया आयाम दिया। राजनाथ सिंह ने कहा कि श्रीलंका की मदद करना भारत के लिए अहसान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।
यानी भारत की रणनीति रक्षा सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता और आपदा राहत—इन सभी क्षेत्रों में श्रीलंका के साथ साझेदारी मजबूत करने की है। यही भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति और हिंद महासागर रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

