नई दिल्ली। महिलाओं के शरीर में उम्र के साथ कई तरह के हार्मोनल बदलाव आते हैं, जिनमें मेनोपॉज़ (पीरियड्स का हमेशा के लिए बंद होना) एक सामान्य प्रक्रिया है। आमतौर पर मेनोपॉज़ 45 से 50 साल की उम्र के बीच होता है, लेकिन अगर यह 40 साल की उम्र से पहले ही हो जाए, तो इसे ‘प्रीमैच्योर मेनोपॉज़’ कहा जाता है। नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ (NIH) के अनुसार, यह कोई अच्छा संकेत नहीं है। ऐसा तब होता है जब महिला के शरीर में अचानक एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे जरूरी रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स का स्तर गिर जाता है और ओवरीज (अंडाशय) काम करना बंद कर देती हैं।
इसके मुख्य कारणों में जेनेटिक्स (पारिवारिक इतिहास), कैंसर का इलाज (कीमोथेरेपी या रेडिएशन), थायरॉइड और रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियां शामिल हैं, जिनमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से ओवरीज को नुकसान पहुँचाने लगता है। इसके अलावा, अत्यधिक स्मोकिंग करने वाली महिलाओं में भी समय से पहले मेनोपॉज़ का खतरा दो साल ज्यादा बढ़ जाता है। प्रीमैच्योर मेनोपॉज़ महिला के शरीर को शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों से प्रभावित करता है।

इसके शुरुआती लक्षणों में पीरियड्स का अनियमित होना, अचानक तेज गर्मी लगना (हॉट फ्लैशेस), रात में पसीना आना, मूड स्विंग्स, एंग्जायटी, नींद न आना और याददाश्त कमजोर होना शामिल हैं। क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, इसका सबसे गंभीर असर महिला के रिप्रोडक्टिव सिस्टम पर पड़ता है, जिससे अंडे बनना बंद हो जाते हैं और इनफर्टिलिटी (बांझपन) की समस्या पैदा होती है। इसके अलावा, एस्ट्रोजन की कमी से वजाइनल टिशू पतले हो जाते हैं और अपनी इलास्टिसिटी खो देते हैं, जिसके कारण वजाइनल ड्राइनेस, संबंध बनाने में दर्द और यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है। इसलिए, शरीर में ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है।
