ज्ञान परंपरा और जुमलेबाजी: गिरीश पंकज

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इन दिनों भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याख्यान आयोजित किया जा रहे हैं. लेखमालाएँ सामने आ रही हैं. मेरा निजी अनुभव यही रहा है कि इन सब मामले में अनेक बंदों ने केवल जुमलेबाजी की है. ज्ञान परंपरा…ज्ञान परंपरा कहने वाले अपने जीवन में खुद कितने अज्ञानी रहे हैं, इसका प्रमाण उनका आचरण देता रहा है. हमारी ज्ञान परंपरा में जो बुनियादी तत्व रहे हैं, उनमें मानव हृदय में करुणा, दया, ममता, त्याग, सहनशीलता, क्षमा, दान-पुण्य समता, उदारता, अस्पृश्यता, अहिंसा, शाकाहार और गौ प्रेम आदि का समावेश रहा है. लेकिन ज्ञान परंपरा की बात करने वाले कितने लोग ज्ञान परंपरा के मूल को अपने आचरण में लागू कर पाते हैं? तो जुमलेबाजी में हमारा कोई सानी नहीं है मंदसौर से ज्ञान परंपरा की दवाई देना बड़ा आसान है ज्ञान परंपरा पर एक लेख लिख देना भी कोई कठिन नहीं है अनेक संदर्भों की भरमार करके एक लंबा लेख लिखा जा सकता है लेकिन जो बातें कहीं जा रही है उन बातों को आत्मसात करना बड़ी बात और वही लोग नहीं कर पाए. अनेक भाषण वीरों को देखा है, जो मंच से आकर ज्ञान परंपरा के दुहाई देते हुए कह रहे हैं अहिंसा परमो धर्म: और कार्यक्रम के उपरांत नॉनवेज खा रहे हैं. भाषण दे रहे हैं कि हमें सहिष्णु होना चाहिए, उदार होना चाहिए और कार्यक्रम के उपरांत बात कर रहे हैं कि फलाना विचारशून्य है,उसको कुछ नहीं आता. कुछ बात करते हैं छुआछूत हटाने की, लेकिन उसी समय कोई भिखारी-सा दिखने वाला व्यक्ति सामने आ जाए तो उसे दुत्कार देंगे. क्या यही है हमारे समय में ज्ञान परंपरा पर विमर्श? दरअसल धीरे-धीरे हमारा समाज पाखंड-पर्व का हिस्सा बनता जा रहा है. जो जितना बड़ा पाखंडी है, वह उतना ही बड़ा चिंतक! जो जितना बड़ा धूर्त है, वह उतना ही बड़ा नेता! जो जितना बड़ा लुटेरा है, वह उतना बड़ा पूँजीपति! जो जितना बड़ा अज्ञानी है, उतना बड़ा शिक्षक! जो जितना बड़ा छलिया है, वह उतना बड़ा प्रवचनकार!!यह समय ऐसे ही लोगों के लिए हिट है. ये लोग ही ज्ञान परंपरा के वाहक बने घूम रहे हैं. उनके व्याख्यान हो रहे हैं. इनका स्वागत सत्कार हो रहा है. ये लोग वायु मार्ग से आते हैं, महंगी गाड़ियों में इधर-उधर घूमते हैं, सितारा होटलों में ठहरते हैं और फिर ज्ञान परम्परा और त्याग आदि पर प्रवचन देते हैं. यह सब देखकर हँसी आती है. तब मेरे जैसे जिज्ञासु के मन में यही सवाल उठता है कि क्या यही हमारी ज्ञान परंपरा है, जो पाखंड कर्म को जीती है ? तब मैं खुद उत्तर देता हूं कि नहीं पाखंड हमारी ज्ञान परंपरा नहीं है. हमारे ज्ञान परंपरा में नैतिकता है, सांस्कृतिक मूल्य है,सनातन का अशुद्ध सात्विक बोध है. लेकिन ऐसे चिंतक मनन करने वाले भुला दिए जाते हैं. उपेक्षित रहते हैं क्योंकि इनके पास कोई पद नहीं होता. समाज में पद की पूछ-परख होती है. लोग ज्ञानी क्या, महाज्ञानी बन रहें,लेकिन उन्हें कोई नहीं पूछता, जब तक उनके पास कोई पदनाम न हो. फिर भी ज्ञान परंपरा अपनी जगह है.आज भी अनेक विभूतियां उस ज्ञान परंपरा को अपनी रचनात्मकता में पिरो कर अपना काम कर रही हैं. इनको पहचान की दृष्टि जब तक विकसित नहीं होगी, प्रतिभा का मूल्यांकन नहीं हो सकेगा. तब तक ज्ञान परंपरा किसी जुमलेबाजी से कम नहीं है.