नई दिल्ली। कल्पना कीजिए कि, आपके शरीर की रक्षा करने वाला इम्यून सिस्टम ही अगर अचानक आपके अंगों को दुश्मन समझकर उन पर हमला कर दे, तो क्या होगा? ‘ल्यूपस’ एक ऐसी ही रहस्यमयी और खतरनाक ऑटोइम्यून बीमारी है, जो शरीर के जोड़ों, त्वचा, किडनी और फेफड़ों को धीरे-धीरे छलनी कर देती है। चौंकाने वाला सच यह है कि इस बीमारी के कुल मरीजों में से 90 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनमें 15 से 44 साल की उम्र वाली युवतियों को सबसे ज्यादा खतरा रहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं के शरीर में मौजूद ‘एस्ट्रोजन’ हार्मोन और उनकी जेनेटिक बनावट इसके पीछे की मुख्य वजह है। महिलाओं में दो X क्रोमोसोम होते हैं, जिनमें इम्यून सिस्टम से जुड़े कई जीन सक्रिय होते हैं। यही कारण है कि महिलाओं का इम्यून सिस्टम पुरुषों के मुकाबले ज्यादा रिएक्टिव होता है, जो संक्रमण से तो बचाता है लेकिन कई बार शरीर के ही खिलाफ काम करने लगता है। इसके अलावा, पीरियड्स, प्रेगनेंसी और मेनोपॉज के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव इस बीमारी को भड़काने (ट्रिगर) का काम करते हैं।

ल्यूपस को ‘द ग्रेट इमिटेटर’ भी कहा जाता है क्योंकि इसके लक्षण जैसे- अत्यधिक थकान, जोड़ों में दर्द, बालों का झड़ना और चेहरे पर चकत्ते-इतने सामान्य होते हैं कि, लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। जेनेटिक्स के साथ-साथ तनाव, प्रदूषण, स्मोकिंग और धूप भी इस खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं। डॉक्टरों की मानें तो ब्लैक और एशियाई महिलाओं में यह जोखिम तीन गुना ज्यादा देखा गया है। चूंकि शुरुआती पहचान ही इस बीमारी से बचने का एकमात्र रास्ता है, इसलिए बार-बार होने वाली थकान या जोड़ों के दर्द को मामूली समझकर टालना जानलेवा साबित हो सकता है।
