पतनशीलता की पराकाष्ठा!-गिरीश पंकज

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राजस्थान में तेरह वर्षीय बच्ची के साथ तेईस नीच लोगों द्वारा बलात्कार की भयावह, शर्मनाक घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। इसके पहले भी देश के विभिन्न क्षेत्र में मासूम बच्चियों, औरतों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या की घटनाएं होती रही हैं। समाज में बढ़ती हुई हिंसा की घटनाएं देखकर कैसे कहा जा सकता है कि यह वही भारत देश है, जहां भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती और न जाने कितने महापुरुषों ने जन्म लिया, जिन्होंने समाज को दिशा देने की कोशिश की । कभी यह देश विश्वगुरु भी रहा, लेकिन आज भारत के पतन को देखकर आश्चर्य होता है। लड़कियों का भी विनाश दिखाई दे रहा है। नई नवेली शादीशुदा औरतें प्रेमियों के साथ मिलकर अपने पतियों की क्रूरता के साथ हत्या कर रही है। यह विषय केवल एक सामाजिक बुराई पर चर्चा मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे सामूहिक विवेक, हमारी सांस्कृतिक पहचान और हमारी नैतिक चेतना के गहरे संकट पर एक अत्यंत गंभीर और पीड़ादायक चिंतन है। राजस्थान की हृदयविदारक घटना हो, या देश के किसी भी कोने में मासूमों के साथ होने वाली हिंसा और हत्याएँ, ये घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं हैं। ये इस बात का जीवंत और खौफनाक प्रमाण हैं कि एक समाज के रूप में हमारा नैतिक पतन किस भयावह स्तर तक हो चुका है। इसके साथ ही, समकालीन समाज में पारिवारिक ढांचों का बिखरना, अनैतिक संबंधों के चलते नवविवाहित महिलाओं द्वारा प्रेमियों के साथ मिलकर अपने ही पतियों की क्रूरता से हत्या कर देने जैसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर हमारे भीतर का ‘मनुष्यÓ कहाँ खो गया है? जब हम भारत के इतिहास को देखते हैं, तो गर्व से हमारा सीना चौड़ा हो जाता है। यह वही भूमि है जहाँ भगवान महावीर और बुद्ध ने अहिंसा, करुणा और ‘जियो और जीने दोÓ का संदेश दिया। उन्होंने जीव मात्र के प्रति संवेदनशीलता सिखाई। स्वामी विवेकानंद  ने पूरी दुनिया के सामने भारतीय संस्कृति की विशालता को रखते हुए हर महिला में ‘मां दुर्गाÓ और ‘मां शारदाÓ का रूप देखने का आह्वान किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों की ओर लौटने का संदेश देकर समाज को पाखंड, कुरीतियों और नैतिक पतन से बचाने का प्रयास किया। जिस देश ने पूरी दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकमÓ का महानतम पाठ पढ़ाया और जो कभी अपने ज्ञान, अध्यात्म और उच्च नैतिक मूल्यों के कारण ‘विश्व गुरुÓ कहलाया, आज उसी देश की सड़कों, घरों और गलियों में मासूम बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं। यह विरोधाभास आत्मा को झकझोर देने वाला है। आज की इस बर्बरता को देखकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि हम उसी महान सनातन और मानवीय संस्कृति के वारिस हैं। आखिर हम इस मोड़ पर कैसे पहुंचे? समाज में बढ़ती इस क्रूरता और हिंसा के पीछे कई गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं, जिसे समझने की आवश्यकता है। आधुनिक समाज में उपभोक्तावादी संस्कृति हावी हो चुकी है। आज इंसान हर चीज तुरंत पा लेना चाहता है, चाहे वह पैसा हो, शक्ति हो या शारीरिक वासना। जब समाज में संयम और संतोष जैसे मूल्यों को कमजोरी मान लिया जाता है, तो वासना और लालच बेलगाम हो जाते हैं। तेरह साल की मासूम बच्ची के साथ 23 लोगों की दरिंदगी यह दर्शाती है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से संवेदनहीन और मानसिक रूप से बीमार हो चुका है, जिसके लिए किसी का जीवन और सम्मान कोई मायने नहीं रखता।