हमारे देश में प्रतिवर्ष लाखों लोगों को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, किन्तु आवश्यकता की तुलना में आपूर्ति का प्रतिशत बहुत ही कम है। यद्यपि भारत में देह- अंगदान को लेकर जागरूकता बड़ रही है किंतु धार्मिक मान्यताएं और अंधविश्वास इस पथ पर स्पीड ब्रेकर बने हुए हैं। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि मस्तिष्क को छोड़कर किडनी, लीवर, लंग्स, नेत्र त्वचा और हृदय सहित अनेक अंगों को मृत देह से लेकर जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहे अन्य जीवित जरूरतमंदों के देह में प्रत्यारोपित करके उनको जीवन दान दिया जा सकता है। एक अंगदाता आठ जरूरतमंदों को जीवन दान दे सकता है। लोकतांत्रिक देश भारत में आम जनता की सेवा -नेतृत्व के लिए ही जनता के द्वारा जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं। देश और जनता के हित- अहित, सुख दु:ख की समझ रखने वाले हितैषियों को ही लोग भरोसे के साथ देश की बागडोर सौंपते है। ऐसे चुने हुए नेता, मंत्री, सांसद, विधायक, सार्वजनिक सभाओं में आजीवन एक ही राग अलापते हैं-हमारा जन्म तो जनता जनार्दन की सेवा के लिए ही हुआ है। सच भी यही है कि जब कोई नेता सरपंच हो कि सांसद बन जाता है तो उसका जीवन व्यक्तिगत ना होकर सार्वजनिक हो जाता है। जिसे दृष्टिगत रखते हुए उनको आम आदमी से ऊपर बड़ी-बड़ी सुविधाएं, बड़े-बड़े पावर देने का प्रावधान रखा गया है। अनपढ़, कम पढ़े लिखे होने के बावजूद चुने हुए जनसेवक -जनप्रतिनिधि गण बड़े बड़े पढ़े लिखे अधिकारियों पर रौब जमाते हैं। खुद तो अस्थाई होते हैं पर पावर फूल इतने ज्यादा रहते हैं कि शासकीय सेवा में स्थाई पदों पर नियुक्त अधिकारियों -कर्मचारियों की वाट लगा देते हैं। देखा जाए तो जनसेवक अनेक अर्थों में राजनीति की दुनिया में माननीय भगवान बन जाते हैं। जिन पर भी उनकी कृपा दृष्टि पड़ जाती है उनकी डूबती नैया पार हो जाती है किंतु किसी पर वक्रदृष्टि पड़ जाए तो उस पर बिजली गिरते देर नहीं लगती है। अत: जनसेवकों का नैतिक दायित्व बनता है कि वे अपना तन- मन- धन सब कुछ देश -जनहित में न्योछावर करते रहें। दिन में कई वे कई कई बार कहते हैं हमारा सब कुछ देशहित -जनहित में समर्पित है। अगर ऐसा है तो सभी जनप्रतिनिधियों को अंगदान और देहदान के लिए भी अवश्य आगे आना चाहिए। जब वे इलेक्शन फॉर्म भरते हैं तो उसमें अनिवार्यता एक कालम होना चाहिए कि मृत्युपरांत वे अपना देह-अंगदान करेंगे। हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और गिरगिट जैसे रंग बदलते अधिकांश नेताओं की सोच यही हो चली है कि कडू कडू जनता का और मीठा मीठा हमारा। ऐसे नेताओं को तो स्वयं ही सोचना चाहिए कि देह- अंगदान उन्हें मृत्युपरांत भी अमर ही बना कर रखेगा। उनकी आंख से कोई देख पाएगा, उनकी किडनी,लीवर, लंग्स से कोई जीवित बच जाएगा। मेडिकल के छात्र बेहतर शिक्षा ले पाएंगे, पर्यावरण पेड़ पौधों को संरक्षण प्राप्त होगा। ऐसे मानवीय कार्य करने वाले जनप्रतिनिधियों के नाम महर्षि दधीचि की तरह इतिहास में लिखा जाएगा। जब जनप्रतिनिधि चयनित हो जाते हैं तभी पदभार ग्रहण करते समय आजीवन सच्ची सेवा और मृत्युपरांत देह -अंग दान का भी शपथ लेना चाहिए। भूतपूर्व, उम्रदराज जन सेवकों को इस दिशा में पहल करना जाहिए। स्कूल कालेज के पाठ्यक्रम में देहदान का समावेश होना चाहिए। बदलते हुए वक्त के साथ दान की परिभाषा करते हुए सभी धर्मों के विद्वान प्रवचन कर्ताओं को देहदान की आवश्यकता और उपादेयता पर भी प्रकाश डालना चाहिए।साथ ही देहदान करके समाज में आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। हाल ही में देश में पहली बार इच्छा मृत्यु को मान्यता दी गई। ऐसी मानवीय सोच की दिशा में आगे बढ़ते हुए जनसेवक देहदान करने आगे आएं। यह एक सराहनीय अनुकरणीय कदम होगा। आम जनता को भी इससे प्रेरणा मिलेगी। देश की दशा दिशा बदल रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से अपेक्षा है कि जनसेवकों के देह- अंगदान दान पर गंभीरता पूर्वक विचार करके ऐसा कोई प्रावधान लाएं। ऐसा कर सकें तो मानवता की दृष्टि से वे इतिहास रच देंगे। जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा चुनी गई सरकार से अपेक्षा है- ‘देहदान महादानÓ को चरितार्थ करके जनसेवक करें जनकल्याण।
देह-अंगदान में जनप्रतिनिधियों का योगदान – विजय मिश्रा
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