भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मामले में दो सरकारी कर्मचारी बरी, कोर्ट ने कहा— वैध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और रिश्वत की मांग का ठोस प्रमाण अनिवार्य
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल रिश्वत की राशि बरामद हो जाने से किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष के लिए यह संदेह से परे साबित करना आवश्यक है कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दो सरकारी कर्मचारियों की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को कानूनी मानकों के अनुरूप साबित करने में विफल रहा। मामले में शिकायतकर्ता द्वारा की गई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग पेश की गई थी, लेकिन उसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाण-पत्र के बिना प्रस्तुत किया गया। अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की वैधता के लिए 65-बी का प्रमाण-पत्र अनिवार्य है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऑडियो रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाजों की पुष्टि के लिए वॉइस सैंपल और फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट जैसे तकनीकी साक्ष्य भी जरूरी होते हैं। इस मामले में न तो शिकायतकर्ता और आरोपियों के वॉइस सैंपल लिए गए और न ही रिकॉर्डिंग का वैज्ञानिक सत्यापन कराया गया। अभियोजन पक्ष के गवाहों ने भी स्वीकार किया कि रिकॉर्डिंग स्पष्ट नहीं थी और उसमें कई लोगों की आवाजें सुनाई दे रही थीं।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी का छह माह से रुका वेतन जारी कराने के लिए दोनों सरकारी कर्मचारियों ने 5,000 रुपये रिश्वत की मांग की थी। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) के निर्देश पर शिकायतकर्ता ने बातचीत रिकॉर्ड की और 12 अक्टूबर 2010 को ट्रैप कार्रवाई के दौरान एक आरोपी की जेब से रिश्वत की रकम बरामद की गई थी।
हालांकि, जांच अधिकारी ने भी अदालत में स्वीकार किया कि आरोपियों और शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल नहीं लिए गए थे। कोर्ट ने माना कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य संबंधी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया, इसलिए ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के लिए रिश्वत की मांग का प्रमाण सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। केवल रिश्वत की राशि की बरामदगी पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। अदालत ने रमेश शर्मा बनाम स्टेट’ मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि टेप रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए आवाज की सही पहचान, रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता, छेड़छाड़ न होने का प्रमाण और अन्य कानूनी आवश्यकताओं का पालन अनिवार्य है।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया तथा दोनों याचिकाकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
