क्वाड का भविष्य भी खतरे में? – संजय सक्सेना

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुछ ज्यादा ही सेल्फ सेंटर्ड यानि आत्मकेंद्रित हो गए हैं? क्या उनके अंदर दुनिया भर पर शासन करने की सनक सवार हो गई है? क्या वह पूरी तरह से तानाशाही मानसिकता से काम कर रहे हैं? ये कुछ सवाल ऐसे हैं, जो वर्तमान में चल रहे पश्चिम एशिया संकट के चलते उठे हैं और इस सबके चलते दुनिया भर के तमाम देश अमेरिका से दूरी बनाते चले जा रहे हैं। ईरान को तबाह करने की बार-बार धमकी देने वाले ट्रम्प हालांकि अभी तक एक असफल कप्तान ही साबित होते दिख रहे हैं, अब वह विश्व स्तरीय संगठनों को भी खत्म करने की धमकी देने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र को लेकर वह कई तरह के बयान दे चुके हैं, फिर नाटो समूह को भी खत्म करने की बात उन्होंने की। इसके बाद अब क्वाड का नंबर भी आ गया है। ट्रम्प के पहले कार्यकाल में क्वाड समूह जिस तेजी के साथ चर्चा में आया था, उनके दूसरे कार्यकाल में यह उतनी ही गुमनामी में पहुंच गया है। ट्रंप प्रशासन ने हाल में क्वाड से दूरी बना ली है, इसके बाद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक अजीब कूटनीतिक स्थिति खड़ी हो गई है। इसका सबूत है कि साल 2025 में क्वाड के रोटेटिंग चेयर के तौर पर भारत का कार्यकाल बिना किसी शिखर सम्मेलन के ही समाप्त हो गया। इसके पीछे भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ विवाद मुख्य कारण रहा। अब नई दिल्ली विदेश मंत्रियों की एक बैठक आयोजित करने की योजना बना रही है। इस बैठक को नेता-स्तरीय बैठक के रूप में पेश किया जाएगा, भले ही इसमें शीर्ष नेता शामिल न हों। इस कदम को भारत की नाराजगी को दूर करने के एक तरीके के रूप में देखा जा रहा है। यह बात और है कि विशेषज्ञों को इस बैठक से बहुत उम्मीद नहीं है। वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर चाइना-अमेरिका स्टडीज के सौरभ गुप्ता के एक बयान के अनुसार इसके नतीजे उस कागज के लायक भी नहीं होंगे, जिस पर वे लिखे गए हैं। उन्होंने इस बैठक को एक मजाक बताया है। असल में क्वाड एक अनौपचारिक रणनीतिक समूह है, जिसमें भारत के साथ ही ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका शामिल हैं। इसे 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने पहले कार्यकाल के दौरान सक्रिय किया था। इसे क्षेत्र में चीन बढ़ते प्रभाव के मुकाबले में एक गैर-सैन्य गठबंधन के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन दिल्ली के साथ टैरिफ तनाव के बीच ट्रंप ने इस समूह को दरकिनार कर दिया है। पिछले साल भारत में इसका शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाना था, लेकिन ट्रंप के शामिल होने से इनकार के बाद यह सम्मेलन नहीं हो पाया। वहीं, सूत्रों का कहना है कि इस बात की संभावना कम ही है कि ट्रंप 14-15 मई को शी जिनपिंग के लिए चीन की यात्रा के दौरान भारत में रुकें। अब अगले महीने दिल्ली में होने वाली क्वाड बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के शामिल होने की बात कही जा रही है। यह 2023 के बाद भारत में क्वाड की पहली बैठक होगी। इस बैठक की मेजबानी करने की बारी ऑस्ट्रेलिया की थी, लेकिन उसने यह जिम्मेदारी नई दिल्ली को सौंप दी। माना जा रहा है यह भारत की नाराजगी को दूर करने का प्रयास है। दरअसल अमेरिकी सांसदों ने मांग की थी कि ट्रंप प्रशासन शी के साथ बैठक से पहले एक क्वाड शिखर सम्मेलन बुलाए। मामले के जानकार इस स्थिति को नाजुक बताते हैं। उनका कहना है कि नेताओं की बैठक होने का दिखावा क्वाड के लिए अच्छी बात नहीं है। उन्होंने कहा कि वैसे भी यह समूह बहुत खास या शानदार काम नहीं कर रहा है। विशेषज्ञ तर्क दे रहे हैं कि रूसी तेल की खरीद, पाकिस्तान के साथ तनाव और भारत की अध्यक्षता में क्वाड को लेकर अरुचि को देखते हुए भारत तो इस समूह के नेता-स्तरीय ढांचे को निलंबित कर देना चाहिए था और वापस अपने मंत्री-स्तरीय प्रारूप पर लौट आना चाहिए था। क्विंसी इंस्टीट्यूट में ग्लोबल साउथ प्रोग्राम के निदेशक सारंग शिदोरे ने कहा कि रुबियो की यात्रा इस बात का संकेत है कि क्वाड शिखर सम्मेलन शायद नेता विहीन होने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन में दिल्ली को लेकर वह आकर्षण नहीं रहा, जो पहले हुआ करता था। जिस तरह से ईरान से समझौते की वार्ता के लिए पाकिस्तान को आगे किया जा रहा है, यह अमेरिका की भारत विरोधी नीति को दर्शाता है। लीसा कर्टिस 2017 से 2021 तक ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति की उप-सहायक और दक्षिण व मध्य एशिया मामले की वरिष्ठ निदेशक रही हैं।

उन्होंने कहा कि क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक को नेता-स्तरीय बैठक का नाम देना ही इस बात पर ध्यान दिलाएगा कि असल में इस बैठक में नेता मौजूद नहीं हैं। इस तरह के आयोजन से दूसरे देशों की नजर में क्वाड की विश्वसनीयता कम होगी। वॉशिंगटन में ट्रंप के बयानों ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। ट्रंप ने चीन के साथ ही भारत के कट्टर दुश्मन पाकिस्तान के प्रति ज्यादा नरम रुख के संकेत दिए हैं। इसे भारत को मुंह चिढ़ाने जैसा ही माना जा रहा है। ट्रंप पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर को अपना पसंदीदा फील्ड मार्शल कह चुके हैं। अब वह चीनी नेता शी जिनपिंग की तारीफ कर रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि जब मैं बीजिंग जाऊंगा, तो राष्ट्रपति शी मुझे गले लगाएंगे। उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया कि चीन ईरान को कोई हथियार दे रहा है। जबकि वर्तमान युद्ध में चीन जिस तरह से ईरान की मदद कर रहा है, लगातार उसके सबूत मिल रहे हैं। कुल मिलाकर जब नाटो के साथ ही संयुक्त राष्ट्र तक की अनदेखी की जा रही है, तो क्वाड को लेकर कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। ट्रम्प जिस तरह से चालें चल रहे हैं, उससे लगता है कि यह संगठन भी भविष्य में टूट सकता है।