स्वतंत्रता सेनानी परिवारों की गणना भी होनी चाहिए! – गिरीश पंकज

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एक महत्वपूर्ण बात की ओर शायद समाज के आम लोगों का भी ध्यान नहीं जा रहा है, और यह शायद अनजाने में ही हो रहा है. हमें आजाद हुए अब तो लगभग अस्सी साल होने जा रहे हैं, इसलिए याददाश्त भी कम हो सकती है कि यह जो आजादी हमें मिली है, वह असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों का ही प्रतिफल है. समाज को उन विभूतियों को निरंतर याद करना चाहिए, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते रहना चाहिए, जिनके कारण देश आजाद हो सका. उन स्वतंत्रता सेनानियों, शहीदों के परिवार के लोग आज भी मौजूद हैं. उनके प्रति भी श्रद्धा का भाव रखना समाज का कर्तव्य है.लेकिन देखने में यही आता है कि लोग स्वतंत्रता सेनानियों को तो भूल ही रहे हैं,उनके परिजनों के प्रति भी कोई बहुत रागात्मक लगाव नहीं दिखाई देता. यह समाज का और सरकार का भी दायित्व है कि वह देश में जातिगत जनगणना के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और शहीदों के वंशजों की गणना भी कराए, ताकि पता तो चले कि इस समय सेनानी परिवार के कितने सदस्य विद्यमान हैं. जाति जनगणना में जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर अलग-अलग गणना का प्रावधान रखा गया है. यह बेहद दुर्भाग्यजनक भी कहा जा सकता है कि हमने मनुष्य समाज को जाति-धर्म के खांचे में बांधकर रख छोड़ा है. हमें इस गणना से आपत्ति नहीं,लेकिन अगर गणना करनी भी है तो स्वतंत्रता सेनानी, शहीदों के परिवार की भी जनगणना करनी चाहिए. ये मु_ी भर लोग गुमनामी के अंधेरे में जीवन यापन कर रहे हैं. अगर उनकी गणना हो तो देश के सामने एक आंकड़ा उपस्थित होगा कि जिन्होंने आजादी के लिए अपना बलिदान किया, संघर्ष किया, उस परिवार के इतने लोग अभी देश में मौजूद हैं. यह दरअसल एक तरह से कृतज्ञता होगी. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि धीरे-धीरे जैसे-जैसे हमारी आजादी पुरानी होती जा रही है, हम अपने महान पूर्वजों को भूलते चले जा रहे हैं. लेकिन जनगणना के बहाने हम उनके आंकड़े तो इक_े कर सकते हैं. हर मकान-दुकान की गणना होती है, तो उन परिवारों की गणना क्यों नहीं, जिनका आजादी की लड़ाई में योगदान रहा है? लेकिन यह तभी संभव है,जब जनगणना में कोई ऐसा कॉलम हो, जिसमें यह लिखा हो कि फलाना परिवार स्वतंत्रता सेनानी परिवार का सदस्य है. अगर ऐसा हो सका तो स्वतंत्रता सेनानी परिवार के लोगों को संतोष होगा कि आज भी समाज के लोग उन्हें याद करते हैं. प्रधानमंत्री सहित समस्त चुने हुए सांसदों का दायित्व है कि संसद में प्रस्ताव पारित करके यह अध्यादेश जारी कराएँ कि जनगणना में एक कालम स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के सदस्यों की जानकारी का भी हो ताकि इस महादेश में कितने परिवार अभी बच्चे हैं, उनकी जानकारी मिल जाएगी. हालांकि यह भावुकता भरी मांग ही है. पता नहीं यह फलित होगी भी नहीं, लेकिन अनेक स्वतंत्रता सेनानी परिवारों से मेरी बात हुई तो यह उनकी भावना है और गलत भावना भी नहीं है. सौभाग्यवश इन पंक्तियों का लेखक भी स्वतंत्रता सेनानी परिवार का एक हिस्सा है. हालांकि मेरे पिता स्वर्गीय कृष्ण प्रसाद उपाध्याय कभी भी स्वतंत्रता सेनानी होने का लाभ नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने पेंशन भी नहीं ली, लेकिन हम सब की इच्छा ज़रूर रही कि कम-से-कम परिवार के लोगों को तो समाज में स्वतंत्रता सेनानी परिवार के रूप में याद किया जाए. हालांकि मेरी व्यक्तिगत रूप से कोई ऐसी ख्वाहिश नहीं रही,लेकिन हजारों स्वतंत्रता सेनानी परिवार के सदस्य अगर यह चाहते हैं कि जनगणना में स्वतंत्रता सेनानी परिवार अलग से रेखांकित किए जाएं, तो यह गलत भी नहीं है. जिन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, उन परिवार को अलग से चिन्हित करना ही चाहिए, यह एक राष्ट्रीय कृतज्ञता है, कर्तव्य भी है,ताकि समाज के अन्य लोगों को हर समय यह महसूस होता रहे कि हमें जो आजादी मिली है, वह प्लेट में सजा कर नहीं दी गई, वरन उसके पीछे जिन लोगों का महान अवदान रहा है, उनके वंशज आज भी हम सबके बीच विद्यमान हैं. उनको आदर दिया ही जाना चाहिए. जो स्वतंत्रता सेनानी फांसी पर चढ़ गए, वे परम पूज्य हैं लेकिन जो सेनानी देश की आजादी के लिए जेलों में वर्षों तक बंद रहे, यातनाएं झेली, वे भी प्रणम्य हैं. उन सब के परिजनों की गणना होनी ही चाहिए.