” हिंदू नववर्ष – हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान “- डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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हिंदू नववर्ष 19 मार्च, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा…

” सूर्य संवेदना पुष्पे , दीप्ति कारुण्यगंधने। लव्ह्ववा शुभम नववर्षे अगस्मिन कुर्यात, सर्वस्य मंगलम ।।”
” अर्थात जिस तरह सूर्य प्रकाश देता है , संवेदना करुणा को जन्म देती है , पुष्प सदैव महकता रहता है । उसी तरह आगे आने वाला हमारा यह नूतन वर्ष आपके लिए हर दिन , हर पल मंगलमय हो । ” हमारा हिंदू नववर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है । यह मंगल दिवस मां अम्बे की पूजा – अर्चना से नौ दिनों तक इस मृत्युलोक में निवास करने वाले हर प्राणी के लिए मां से मंगल कामना करता है । बे – वजह की फूहड़ता से कहीं दूर हिंदू नववर्ष पूरी धरती को आध्यात्म और धर्म की रस धारा में डूबा जाता है । राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने वाला हमारा पुण्य दिवस अपना अलग वैभव प्रकट करता प्रतीत होता है । अंग्रेजी वर्ष 2026 शुरू होने के डेढ़ माह की कुछ अवधि के पश्चात विक्रम संवत् 2083 की शुरुआत हिन्दू धर्मावलंबियों को उनके गौरवशाली इतिहास की याद भी दिलाता दिखेगा । हमारे हर संवत्सर का एक नाम विशेष हुआ करता है । इस वर्ष शुरू होने वाले संवत्सर का नाम ” रौद्र संवत्सर ” होगा । इसका तात्पर्य भगवान शिव के रौद्र रूप से लगाया जाता है , जो उथल – पुथल , प्राकृतिक आपदाओं , युद्ध जैसी स्थिति तथा महंगाई की ओर संकेत करता है । संक्षेप में कहें तो यह ऐसा संवत्सर है , जो बदलावों और कड़े अनुभवों के माध्यम से आत्मसुधार और संभलने का संदेश देता है ।
वास्तव में विचार किया जाए तो विक्रम संवत् किसी जाति , वर्ग , देश अथवा संप्रदाय का नहीं वरन मानव मात्र का नववर्ष है । यह विशुद्ध रूप से भौगोलिक पर्व माना जा सकता है । कारण यह कि प्रकृति के दृष्टिकोण से वृक्ष – वनस्पति , फूल – पत्तियों में भी नव सृजन इसी दौरान दिखाई पड़ता है । वृक्षों में नई कोंपले, नया आवरण पहने दृश्यांकित होती है । दूसरी ओर चारों दिशाओं में बसंत ऋतु का वर्चस्व अपना नजारा प्रस्तुत करता नजर आता है । रबी की नई फसल कृषक परिवार में आने से कृषक समुदाय के साथ ही पूरा मानवीय समाज प्रसन्नचित दिखाई पड़ता है । नवीनता के प्रतीक हिन्दू नववर्ष में – नई ऋतु , नई फसल , नई पवन , नई खुशबू , नई चेतना , नया रक्त , नई उमंग , नया संवत्सर – नवीनताओं की बहार के साथ हर प्राणी में नई ऊर्जा का संचार कर जाता है । हमारा नववर्ष अमानवीयता तथा दानवता , सांप्रदायिकता , भाषावाद , क्षेत्रीयता , संकीर्णता आदि भेदभाव को पाप मानते हुए विश्व बंधुत्व और प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव जगाने का संदेश देता है । हम देख रहे हैं कि आधुनिक सभ्यता की अंधी दौड़ में समाज का एक वर्ग इस पुण्य दिवस को विस्मृत कर चुका है ! आवश्यकता है इस महत्वपूर्ण दिवस के इतिहास के गहन अध्ययन की । यह सुनिश्चित है कि हमारा स्वाभिमान विक्रम संवत् के साथ ही जागृत रह सकता है ।

हमारा इतिहास बताता है कि बीते 2000 वर्षों में अनेक देशी और विदेशी राजाओं ने अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की तुष्टि करने तथा भारतवर्ष को राजनैतिक दृष्टि से पराधीन बनाने के उद्देश्य से अनेक संवतों को चलाया ! यह भी सर्वविदित है कि भारत राष्ट्र की पहचान विक्रम संवत् के साथ ही जुड़ी रही । आज स्थिति विकट है । जहां देखो वहां ईस्वी सन का बोलबाला है ! हमारे अपने देश के लोग भारतीय तिथि , मास की काल गणना से अनभिज्ञ होते जा रहे हैं ! यह गंभीर चिंतन का विषय होना चाहिए । हमारे समाज में कोई भी मंगल कार्य पंचांग में गृह स्थिति के अनुसार ही किए जाते हैं । बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण , मुंडन , शिक्षा , विवाह आदि सामाजिक अनुष्ठान पंचांग पद्धति पर ही आधारित रहा है । बावजूद इन सबके बच्चों को हिंदी तिथियां प्रतिपदा से लेकर अमावस्या और पूर्णिमा का ज्ञान न होना हिन्दू धर्म के लिए चिंता की बात है । हमारे बच्चे जनवरी से दिसंबर बड़े फर्राटे के साथ बता दिया करते हैं , किंतु चैत्र माह से लेकर फाल्गुन मास की नामावली उनके लिए आसमान से तारे तोड़ लाने जैसी कठिन विधा क्यों बन गई है ? इस पर जरूर गोष्ठी आदि का आयोजन होना चाहिए । बच्चों को शालाओं में वैदिक गणित के साथ हिंदू धर्म के माहों की तिथियां एवं उनके महत्व की जानकारी पाठ्यक्रम के माध्यम से दिया जाना मुझे प्रासंगिक लगता है ।

प्राचीन भारतीय खगोलविद – आर्यभट्ट तथा भास्कराचार्य ने सदियों पहले ही सौर और चंद्र ग्रहणों की सटीक भविष्यवाणी कर दी थी । इसके अलावा भारतीय गणितज्ञों ने शून्य और दशमलव प्रणाली की अवधारणा प्रस्तुत की , जो आधुनिक गणित के नींव साबित हुए । त्रिकोणमिति की जड़ें भी भारतीय खगोल विज्ञान में बहुत पहले से मौजूद पाई गईं । पश्चिमी दुनिया ने इसे बाद में विकसित करने का कार्य किया । इन्हीं सारी विशेषताओं के चलते भारतीय नववर्ष न केवल एक तिथि परिवर्तन है बल्कि प्रकृति और सृजनात्मकता के उत्सव के रूप में एक बड़ा आयोजन भी है । भारतीय नववर्ष वैज्ञानिकता से सीधा संबंध रखता है । हमारा कैलेंडर चंद्रमा के मार्ग पर स्थिति 27 नक्षत्रों का गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है । ये सारे नक्षत्र खगोलीय पिंडों की गति से सीधे संपर्क में होते हैं । यही नक्षत्र ऋतु परिवर्तन को भी दर्शाते हैं । हिंदू पंचांग ही एक ऐसा वैज्ञानिकता से भरा – पूरा कैलेंडर है, जो अधिमास की अवधारणा को भी प्रमाणित करता है । चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है , जो सौर वर्ष 365 दिन से लगभग 11 दिन छोटा होता है । इस अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग हर 32.5 माह में एक अतिरिक्त माह जोड़ा जाता है , जिसे मलमास अथवा अधिमास कहा जाता है ।

हिंदू नववर्ष दो प्रमुख पद्धतियों चंद्र नववर्ष और सौर नववर्ष पर आधारित है । चंद्र नववर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है । यह प्रायः मार्च या अप्रैल में आता है । इसे उत्तर भारत , महाराष्ट्र , कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में मनाया जाता है । इसी तरह सौर नववर्ष की शुरुआत मेष संक्रांति से होती है । यह अप्रैल के मध्य में आती है । इसे पंजाब , तमिलनाडु , बंगाल , असम ,उड़ीसा , बिहार , झारखंड , उत्तर प्रदेश और केरल में उत्साह पूर्वक मनाया जाता है ।