वंदे मातरम विधेयक-गिरीश पंकज

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राज्यसभा में वंदे मातरम बिल पास हो गया है। राष्ट्रगान Óजन गण मनÓ की तरह वंदे मातरम को भी राष्ट्रगीत माना गया है। दुर्भाग्य की बात यह रही कि बहुत से लोगों ने इस राष्ट्रगीत को महत्व नहीं दिया और समय-समय पर उसकी अवहेलना भी करते रहे हैं। उसी घटिया मानसिकता को ध्यान में रखकर सरकार ने विधेयक लाने का निर्णय किया और उसे पास भी कर दिया गया। अब जो कोई भी वंदे मातरम का अपमान करेगा, उसे तीन वर्ष की जेल होगी. हालांकि इसे लेकर एक धर्म विशेष के कुछ लोग ज्यादा चिंतित हैं क्योंकि उन्होंने कभी भी राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया। वे अब पशोपेश में हैं कि क्या किया जाए। अब तो कानून ही बन गया है, तो मजबूरी में ही सही, राष्ट्रगीत का सम्मान तो करना ही होगा। ऐसे लोगों को तलखी के साथ चेतावनी देते हुए कहा जाता था कि ‘अगर भारत देश में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगाÓ। कानूनी पहलुओं से परे जाकर देखें, तो राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल दंड के भय से नहीं, बल्कि नागरिक चेतना और आंतरिक निष्ठा से उपजना चाहिए। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम दिन तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित ‘वंदे मातरमÓ को Óजन गण मनÓ के समान ही ऐतिहासिक और पवित्र दर्जा दिया जाएगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान Óवंदे मातरमÓ केवल एक गीत नहीं था, बल्कि यह देश के हर कोने में क्रांति की अलख जगाने वाला मूलमंत्र था, जिसने लाखों युवाओं को मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा दी। आज जब देश विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है, तब ऐसे राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक संवाद की आवश्यकता और बढ़ जाती है। समाज के कुछ वर्गों में राष्ट्रगीत के कुछ अंशों या इसके संदर्भों को लेकर जो संशय या हिचकिचाहट रही है, उसे केवल कानूनी सख्ती के बजाय आपसी संवाद, सही ऐतिहासिक जानकारी और जागरूकता के माध्यम से दूर करना अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है। राष्ट्रगीत किसी एक वर्ग या धर्म का न होकर पूरी राष्ट्र-चेतना का प्रतीक है। जब कानून की बाध्यता और नागरिक दायित्व एक साथ मिलते हैं, तो देश की अखंडता और मजबूत होती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और नागरिक समाज मिलकर इस कानून के प्रति कैसे सकारात्मक वातावरण बनाते हैं, ताकि ‘वंदे मातरमÓ का गायन किसी मजबूरी का विषय न बनकर, स्वत:स्फूर्त राष्ट्रीय गौरव का माध्यम बना रहे। यहाँ एक बात पर ध्यान देना प्रासंगिक होगा कि वर्तमान में भारतीय संसद द्वारा ‘वंदे मातरमÓ को लेकर अलग से ऐसा कोई नया दंड विधेयक पारित नहीं किया गया है जिसमें 3 वर्ष की सजा का प्रावधान हो। ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971Ó मुख्य रूप से राष्ट्रध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान को दंडनीय अपराध बनाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों में राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने और इसके सम्मान को लेकर कई बार याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। अब देखना यह है कि विधायक पारित होने के बाद देश में एक वर्ग विशेष के लोग किस तरह की प्रक्रिया व्यक्त करते हैं। वंदे मातरम को लेकर किसी कवि ने बहुत अच्छी कविता कही है कि ‘चाहे जिंदा रहें चाहे मर जाए हम /गाएंगे-गाएंगे पर वंदे मातरमÓ।