बीजिंग। चीन के जाने-माने अर्थशास्त्री गाओ शानवेन का निधन हो गया है। सरकारी मीडिया के अनुसार, उनकी मौत की वजह “अज्ञात बीमारी” बताई गई है। वह 55 वर्ष के थे। गाओ शानवेन उस समय सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने चीन के आर्थिक विकास के आधिकारिक आंकड़ों की सटीकता पर सवाल उठाए थे। गाओ की मौत के बाद चीन में उन लोगों को लेकर फिर चर्चा शुरू हो गई है, जो सरकार के आधिकारिक दावों को चुनौती देते रहे हैं। गाओ इससे पहले भी कई बार सार्वजनिक जीवन से दूर हो चुके थे और लंबे समय तक नजर नहीं आए थे।
सरकारी निवेश फर्म SDIC सिक्योरिटीज से जुड़े गाओ वर्ष 2024 में वॉशिंगटन में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान चर्चा में आए थे। उन्होंने दावा किया था कि पिछले कुछ वर्षों में चीन की वास्तविक GDP वृद्धि सरकारी आंकड़ों से काफी कम रही है। उनके अनुसार, वास्तविक विकास दर लगभग 2 प्रतिशत के आसपास हो सकती है, जबकि चीनी अधिकारियों ने करीब 5 प्रतिशत की वृद्धि का दावा किया था। सम्मेलन के बाद चीन लौटने पर गाओ कुछ समय के लिए सार्वजनिक गतिविधियों से दूर हो गए थे। वर्ष 2025 में वह थोड़े समय के लिए फिर दिखाई दिए, लेकिन इसके बाद उनकी सार्वजनिक मौजूदगी काफी कम रही।
चीन के सरकारी अखबार ‘शंघाई सिक्योरिटीज न्यूज’ ने उनकी मौत की जानकारी दी और उन्हें चीन के पूंजी बाजार के सबसे प्रभावशाली मैक्रो-इकोनॉमिस्ट में से एक बताया। हालांकि, रिपोर्ट में उनकी मौत के कारणों की विस्तृत जानकारी नहीं दी गई। गाओ की लंबी अनुपस्थिति के दौरान उनके जांच के दायरे में होने की चर्चाएं भी सामने आई थीं। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। कुछ समय पहले उनके स्वास्थ्य को लेकर भी अटकलें लगाई गई थीं, लेकिन कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई। गाओ की मौत की खबर चीनी सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बनी। कई यूजर्स ने आर्थिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखने के लिए उनकी प्रशंसा की।
उनकी मौत ने चीन में उन अन्य चर्चित मामलों की भी याद दिलाई, जिनमें सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले लोग बाद में हिरासत, गायब होने या अस्पष्ट परिस्थितियों से जुड़े रहे हैं। इनमें कोरोना वायरस को लेकर शुरुआती चेतावनी देने वाले डॉक्टर ली वेनलियांग, नागरिक पत्रकार झांग झान और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता लियू शियाओबो जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, चीनी सरकार अपने कानूनी और प्रशासनिक सिस्टम का बचाव करती रही है, लेकिन आलोचकों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से जुड़े मामलों पर अंतरराष्ट्रीय संगठनों की नजर बनी हुई है।
