आपदा और विपदा का संबंध मनुष्य के जीवन से जन्मजात जुड़ा होता है। ए किसी से जुदा नहीं होतीं, किसी को छोड़ती नहीं। राजा हो या रंक सबका पीछा बिल्ली की तरह दबे पांव करते रहती हैं। इस ताक में रहती हैं कि मनुष्य कब लापरवाही करे और हमारे क्रूर जबड़े का वह शिकार बन जाए। जगजाहिर है कि प्राकृतिक हो या मानव जनित आपदाएं – विपदाएं कभी बता कर नहीं आतीं, अत: बुद्धिमानी इसी में है कि संकट का पूर्वानुमान लगाकर सजगता बरती जाए। दुर्घटना पूर्व सुरक्षा का पुख्ता प्रबंध हो । इतिहास साक्षी है कि जितनी ही आपदाएं- विपदाएं आई हैं उनमें से अधिकांश में मानवी चुक, लापरवाही को ही एक बड़ा कारण पाया गया है। हालांकि प्राकृतिक आपदाएं यथा बादल का फटना, भूस्खलन, भूकंप, चक्रवात, सुनामी, कोविड महामारी, बाढ़ को रोकने में मनुष्य विवश रहता है, किंतु अत्याधुनिक सूचना- संचार और सुरक्षा उपकरणों के ईजाद हो जाने से विपत्ति की पूर्व सूचना कुछ समय पूर्व अब मिल जाती है। यही वजह है कि आज के युग में महामारी महाप्रलय जैसी आफत की घड़ी में भी जान माल की क्षति के प्रतिशत में पहले की तुलना में कमी आई है। यद्यपि दावा के साथ कभी नहीं कह सकते कि अब इंसान के जीवन में आपदा विपदा का नामोनिशान मिटा दिया गया है। समय-समय पर देश-विदेश में हो रही आगजनी, औद्योगिक दुर्घटनाएं, प्राकृतिक आपदाएं मनुष्य को इस बात के प्रति सिर उठाकर आगाह करती हैं। इंसानी लापरवाही को नियंत्रित करने और जागरूकता बनाए रखने हेतु सचेत रहने का संकेत देती हैं। फिर भी कहीं न कहीं भूल- चुक से होती हृदय विधायक दुर्घटनाओं की खबरे प्रिंट- इलेक्ट्रानिक-सोशल मीडिया में सुबह से रात प्रसारित-प्रकाशित होते रहती हैं। भोपाल के यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में वर्ष 1984 दिसम्बर में हुए मिथाइलआइसो सायनाइड गैस का रिसाव दुनिया का सबसे भीषण औद्योगिक आपदा में से एक रहा है। उसकी यादें तस्वीरें आज भी मन मस्तिष्क को झकझोर कर रख देती है। इसके बाद भी अनेक औघोगिक दुर्घटनाएं हुई हैं। हो रही हैं। अस्पताल, बहुमंजिला रहवासी, कार्यालय- कोचिंग भवन, बाजार-गोदाम घनी आबादी, ट्रेन, बस, एरोप्लेन नौका में उठती आग की ज्वालाएं सब कुछ जला कर राख कर दे रही हैं। ऐसी घटनाओं की जांच से हर बार मानवीय लापरवाही के अलावा शासन की उदासीनता भी छनकर बाहर आती है। इससे तो यही उजागर होता है कि ऐसी आपदाओं- विपदाओं की चेतावनी को आमजन और जिम्मेदार शासकीय अमला भूला देता है। ऐसी दुर्घटनाओं का दोहराव ना हो कि चिंता को छोड़कर जब तक जियो शान से जियो भले ही उधार लेकर घी पियो या फिर मस्तराम मस्ती में आग लगे बस्ती में की तर्ज पर जीवन जीने लगता है। तभी तो अधिकांश बड़े संस्थानों के अग्निशमन यंत्र खराब पड़े रहते हैं। आपातकालीन गेट पर जंग लगा होता है वह जाम हो चुका होता है। भवन निर्माण संबंधी सुरक्षा यथा विद्युत वायरिंग बिल्डिंग मटेरियल लिफ्ट की दुर्दशा आपातकालीन द्वार का ना होना, गलीनुमा अंधेरी संकरी सीढिय़ां, रोशनी हवा के लिए समुचित आकर के वेंटिलेशन का अभाव, निर्धारित क्षमता से अधिक लोगों का जमावड़ा आदि खतरनाक स्थितियां को नजर अंदाज कर दिया जाता है। फलस्वरूप अनेक निर्दोष लोगों की जान चली जाती है। ऐसी लापरवाही के लिए जवाब देही कड़ाई पूर्वक निश्चित होना चाहिए। सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करने के लिए ही भवन निर्माण नक्शा स्वीकृति, उद्योगों में सुरक्षा व्यवस्था की जांच हेतु विभिन्न शासकीय कार्यालय में अधिकारियों कर्मचारियों के होते हुए भी जब कभी आगजनी या जर्जर भवन की घटनाएं होती हैं तो उसे क्षेत्र विशेष के ऐसे विभागों में बैठे अधिकारियों-कर्मचारियों की फौज की भी परेड होनी चाहिए। अवैधानिक असुरक्षित भवन निर्माण के लिए ऐसे वेतन भोगी अमलों की जवाबदेही तय करके कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के साथ दंडित किया जाना चाहिए। करे कोई भरे कोई की नीति चलती रहेगी तो त्रासदियां होती रहेंगी। निर्दोष विद्यार्थी ,मजदूर और आम जनता काल कवलित होते रहेंगे। आगजनी के अधिकांश कारण ज्वलनशील पदार्थों का संग्रहण, विस्फोटक सामग्रियों की अवैध आपूर्ति को भी बताया जाता है अत: ऐसे पदार्थों का सार्वजनिक स्थल, ट्रेन, बस परिवहन पर सख्त पाबंदी और कठोर दंड का प्रावधान आवश्यक है। ऐसे कृत्य देशद्रोह की तरह जघन्य अपराध है। हाल ही में राजधानी रायपुर में हुई आगजनी की घटनाओं में विद्युत सुरक्षा के प्रति लापरवाही, सुरक्षा मानकों के विपरीत सस्ते काम चलाओ सामग्रियों का उपयोग, शार्टसर्किट जैसी बातें सामने आई है अत: विद्युत विषयक सावधानी की नितांत आवश्यकता है। वर्षा काल में विद्युत दुर्घटनाएं बढ़ जाती हैं। कटे -फटे- पुराने वायरों का उपयोग, विद्युत के अवैध कनेक्शन जान माल की भारी क्षति का कारण बनते हैं। अत: स्मरण रखें- विद्युत का वैध कनेक्शन अर्थात समुचित रोशनी सुरक्षित जीवन।
बताकर नहीं आतीं आपदा- विपदा: विजय मिश्रा
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