नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आगामी जनगणना में जाति आधारित गणना को शामिल न करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि, जनगणना में जातिगत आंकड़े जुटाना या न जुटाना पूरी तरह से सरकार का नीतिगत फैसला है और इसमें न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं दिखती।
यह फैसला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सुनाया। याचिकाकर्ता ने अदालत में तर्क दिया था कि, जातिगत आंकड़ों का गलत इस्तेमाल हो सकता है और सरकार के पास पहले से पर्याप्त डेटा उपलब्ध है, इसलिए नई गणना की कोई जरूरत नहीं है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि, पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए सही योजनाएं बनाने हेतु सरकार के पास ओबीसी (OBC) और अन्य पिछड़े समूहों की सटीक संख्या की जानकारी होना जरूरी है। कोर्ट ऐसे मामलों में तब तक दखल नहीं दे सकता जब तक कि वह कानून के खिलाफ न हो।
इस बीच, देश में बहुप्रतीक्षित जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। जनगणना दो चरणों में पूरी तरह से डिजिटल माध्यम से आयोजित की जा रही है। इसका पहला चरण 1 अप्रैल से शुरू हो चुका है, जो 30 सितंबर 2026 तक चलेगा। शुरुआत में इसे दिल्ली (NDMC और कैंट), गोवा, कर्नाटक, ओडिशा, सिक्किम, मिजोरम, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे 8 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया है। पहले चरण में हाउस लिस्टिंग और घरों की गणना की जा रही है, जबकि दूसरे चरण में 2027 से परिवार के प्रत्येक सदस्य की व्यक्तिगत जानकारी जुटाई जाएगी। खास बात यह है कि इस बार पहली बार जनता को 15 दिनों की ‘स्व-गणना’ (Self-Enumeration) का विकल्प भी दिया गया है।
