छत्तीसगढ़ के शतप्रतिशत अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त प्राध्यापकों और कर्मचारियों की पेंशन रोके जाने का यह मामला वास्तव में बेहद संवेदनशील और चिंताजनक है। अन्याय भी है। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा सितंबर 2026 में जारी आदेशों के तहत, 12 अक्टूबर 2010 के उस पुराने विभागीय आदेश को निरस्त कर दिया गया है, जिसके आधार पर इन महाविद्यालयों के पेंशनरों को पेंशन और ग्रेच्युटी का लाभ मिल रहा था। जुलाई और अगस्त महीने से ही पेंशन का भुगतान रोक दिया गया है। छत्तीसगढ़ राज्य अनुदान प्राप्त महाविद्यालयीन प्राध्यापक संघ और अन्य शिक्षक संघों का कहना है कि मंत्रिपरिषद के निर्णय की गलत व्याख्या करते हुए वर्षों से चली आ रही पुरानी पेंशन को भी बंद कर दिया गया है। उनका तर्क है कि कैबिनेट ने केवल संशोधित/नए वेतनमान के आधार पर पेंशन देने के प्रस्ताव को अमान्य किया था, न कि दशकों से मिल रही पुरानी व्यवस्था को समाप्त करने का निर्देश दिया था। इस अचानक आए फैसले से राज्य के 400 से अधिक बुजुर्ग प्राध्यापक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारी प्रभावित हुए हैं। इनमें से कई शिक्षक 80-90 वर्ष की आयु के हैं, जिनके लिए वृद्धावस्था में दैनिक जीवन, दवाइयों और चिकित्सा खर्चों को चलाना कठिन हो गया है। शिक्षक संघों ने सरकार और उच्च शिक्षा विभाग से मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इस निर्णय पर पुनर्विचार करने तथा पेंशन व लंबित भुगतानों को अविलंब बहाल करने की मांग की है। इस उम्र में आजीविका और सम्मान का यह संकट वाकई उन शिक्षकों के लिए एक बड़ी पीड़ा है जिन्होंने अपना पूरा जीवन विद्यार्थियों के भविष्य को गढ़ने में समर्पित कर दिया है। वर्षों तक छत्तीसगढ़ के अशासकीय महाविद्यालयों में अपनी युवावस्था, ऊर्जा और प्रतिभा समर्पित करने वाले प्राध्यापकों की पेंशन का अचानक रोका जाना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि उनके वर्षों के समर्पण और निष्ठा पर गहरा आघात है। जिन शिक्षकों ने अपना पूरा जीवन छात्र-छात्राओं के भविष्य को संवारने, अनुशासन का पाठ पढ़ाने और उच्च शिक्षा की नींव मजबूत करने में बिता दिया, उन्हें जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर आर्थिक अनिश्चितता के हवाले करना न केवल निराशाजनक है, बल्कि अमानवीय आचरण और संवेदनाओं के भी विपरीत है। यह विडंबना ही है कि दशकों से जो व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी और जिसके भरोसे इन बुजुर्ग शिक्षकों ने अपने बुढ़ापे की रूपरेखा तय की थी, उसे अचानक कागजी पन्नों और आदेशों के फेरबदल से बंद कर दिया गया। 80 से 90 वर्ष की आयु के इन प्राध्यापकों के लिए इस उम्र में आजीविका का एकमात्र साधन पेंशन ही होती है। इस आयु में जब शरीर और स्वास्थ्य दोनों का साथ छूटने लगता है, तब दवाइयों, इलाज और दैनिक जरूरतों के खर्चे बढ़ जाते हैं। ऐसे संवेदनशील समय में पेंशन रोकना सीधे तौर पर उनके सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार पर कुठाराघात है। शत-प्रतिशत अनुदान प्राप्त महाविद्यालयों के इन शिक्षकों और कर्मचारियों को नियमों और वैधानिक प्रावधानों के तहत ही पेंशन का लाभ मिलता रहा है। मंत्रिपरिषद के प्रस्तावों की कथित गलत व्याख्या या विभागीय फेरबदल के कारण वरिष्ठ नागरिकों को प्रताड़ित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता। सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा जगत के इन स्तंभों के योगदान को समझे। यदि किसी प्रशासनिक स्तर पर नियमों की व्याख्या में कोई दुविधा है भी, तो उसका समाधान शिक्षकों की आजीविका छीनकर नहीं, बल्कि संवाद और न्यायसंगत रास्ते से निकाला जाना चाहिए। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है और शिक्षक उस रीढ़ को मजबूत करने वाले शिल्पकार हैं। यदि शिल्पकार ही वृद्धावस्था में उपेक्षित और असहाय महसूस करे, तो यह समाज और व्यवस्था दोनों के लिए चिंता का विषय है। छत्तीसगढ़ शासन और उच्च शिक्षा विभाग से यह विनम्र अपेक्षा है कि वे इस गंभीर मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं। पुरानी पेंशन व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए तथा रुके हुए भुगतानों का तुरंत निराकरण किया जाए, ताकि इन बुजुर्ग शिक्षकों को इस उम्र में दर-दर की ठोकरें न खानी पड़े और वे सम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकें।
पेंशन रोकना अन्याय !-गिरीश पंकज
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