पूजा में कपूर जलाने की परंपरा क्यों है खास? आस्था के साथ जुड़े हैं आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण

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नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पूजा और आरती के दौरान कपूर जलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे केवल धार्मिक रीति-रिवाज नहीं माना जाता, बल्कि इसके पीछे आध्यात्मिक मान्यताओं के साथ कुछ व्यावहारिक कारण भी बताए जाते हैं। कपूर की सुगंध और उसका पूरी तरह जलकर समाप्त हो जाना इसे विशेष महत्व देता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कपूर को शुद्धता और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। जब कपूर जलता है तो वह बिना किसी अवशेष के समाप्त हो जाता है, जिसे अहंकार और नकारात्मक विचारों को त्यागकर ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश माना जाता है। पूजा के समय कपूर की सुगंध घर के वातावरण को शांत और सकारात्मक बनाने में सहायक मानी जाती है। कई लोग मानते हैं कि इससे मन को शांति मिलती है और ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। आरती के अंत में कपूर जलाने की परंपरा इसी आध्यात्मिक भावना से जुड़ी हुई है।

व्यावहारिक रूप से भी कपूर का उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है। इसकी खुशबू कीट-पतंगों को दूर रखने में मदद कर सकती है और कई घरेलू उत्पादों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, कपूर के स्वास्थ्य लाभों को लेकर कई पारंपरिक मान्यताएं हैं, लेकिन इसका उपयोग सीमित मात्रा में और सावधानी से करना चाहिए। पूजा में कपूर जलाना आज भी आस्था, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।