33 साल की कानूनी लड़ाई के बाद ग्रामीण को मिला सरकारी जमीन का मालिकाना हक, जिला अदालत ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

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बिलासपुर। करीब 33 वर्षों तक सरकारी भूमि पर लगातार खेती करने और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद बिलासपुर के एक ग्रामीण को आखिरकार उसी जमीन का मालिकाना हक मिल गया। 10वें जिला एवं सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने नारायण प्रसाद सूर्यवंशी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने माना कि वादी ने सरकारी भूमि पर 33 वर्ष 11 माह तक खुले, शांतिपूर्ण और निर्बाध कब्जे को दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों से सिद्ध किया है। प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) के सिद्धांत के आधार पर न्यायालय ने उन्हें भूमि के स्वामित्व का अधिकार प्रदान किया।

मामला ग्राम सर्वन देवरी स्थित खसरा नंबर 894 की 0.340 हेक्टेयर शासकीय भूमि से जुड़ा है। इस जमीन पर नारायण प्रसाद के पिता बिसराम वर्षों से खेती करते थे और 30 मई 1988 को तत्कालीन नायब तहसीलदार ने उनके कब्जे को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया था। पिता के निधन के बाद नारायण प्रसाद ने खेती जारी रखी। वर्ष 2001 में ग्राम पंचायत द्वारा भूमि पर हस्तक्षेप और पेड़ों की कटाई के प्रयास के बाद विवाद शुरू हुआ, जो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

जिला अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जे का दावा स्थापित करने के लिए निर्धारित 30 वर्ष की अवधि से अधिक समय तक वादी का कब्जा साबित हुआ है। अदालत ने यह भी माना कि राज्य शासन वादी के कब्जे से जुड़े दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों का प्रभावी खंडन नहीं कर सका। न्यायालय ने राज्य शासन और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना नारायण प्रसाद को भूमि से बेदखल न किया जाए तथा राजस्व अभिलेखों में उनका नाम दर्ज करने की प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। यह फैसला सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जे से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है।