देहरादून। विशाल निर्जन पठार, याकों के झुंड, बौद्ध भिक्षु और दलाई लामा की पावन भूमि-तिब्बत की राजधानी ‘ल्हासा’ का नाम सुनते ही मन में एक अलौकिक छवि उभरती है। ‘धूप का शहर’ कहे जाने वाले ल्हासा की यात्रा किसी भी मुसाफिर के लिए किसी सपने से कम नहीं है। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित यह शहर प्राकृतिक सुंदरता और बौद्ध धर्म की समृद्ध विरासत का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
ल्हासा में प्रवेश करते ही सबसे ज्यादा ध्यान यहाँ की ‘ल्हासा नदी’ और निर्मल जलधाराएं खींचती हैं। घनी आबादी के बावजूद नदियां इतनी स्वच्छ और शीशे जैसी पारदर्शी हैं कि इनकी स्वच्छता देखकर स्विट्जरलैंड की यादें भी धुंधली पड़ जाती हैं। शहर का ऐतिहासिक ‘पोटाला पैलेस’, जो कभी दलाई लामाओं का शीतकालीन निवास हुआ करता था, लाल पर्वत पर शान से खड़ा अपनी वास्तुकला की भव्यता बयां करता है। इसके अलावा, मानव निर्मित सबसे बड़े उद्यानों में शामिल ‘नोरबुलिंगका पैलेस’ और आदिम सभ्यता को समेटे ‘शिजांग संग्रहालय’ तिब्बती संस्कृति का सजीव ताना-बाना पेश करते हैं।
चांदनी चौक जैसी हलचल से भरी ‘बरखोर स्ट्रीट’ में जहाँ आपको पारंपरिक तिब्बती व्यंजनों का स्वाद और खरीदारी का मज़ा मिलता है, वहीं पास ही स्थित ऐतिहासिक ‘जोखांग मंदिर’ में दंडवत प्रणाम करते श्रद्धालु और धर्मचक्र घुमाते लामा माहौल को पूर्णतः आध्यात्मिक बना देते हैं। चौड़ी साफ सड़कें, मुस्कुराते चेहरे और चारों ओर फैली बौद्ध विरासत ल्हासा के हर कोने को बेहद रोमांचक और दर्शनीय बनाती हैं।
