अनंत चतुर्दशी का खास अनंत सूत्र, जानें क्यों है इसका धार्मिक महत्व

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अनंत चतुर्दशी 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह दिन दो बड़ी परंपराओं के लिए खास माना जाता है – एक तरफ भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा कर कलाई पर अनंत सूत्र (रक्षा सूत्र) बांधा जाता है, तो दूसरी तरफ इसी दिन दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन गणपति बप्पा के विसर्जन के साथ होता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर इन दोनों परंपराओं की शुरुआत कैसे हुई और इनका आपस में क्या नाता है।

अनंत चतुर्दशी का पौराणिक महत्व:
अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु के “अनंत” स्वरूप को समर्पित है। “अनंत” शब्द का अर्थ है – जिसका कोई अंत न हो, यानी जो शाश्वत और अनादि है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा उनके शेषनाग रूप में की जाती है, इसीलिए इसे अनंत चतुर्दशी कहा जाता है।

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महाभारत काल से जुड़ी कथा:
इस व्रत की सबसे प्रचलित कथा महाभारत काल से जुड़ी है। मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वनवास काट रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अनंत चतुर्दशी का व्रत रखने और अनंत सूत्र धारण करने की सलाह दी थी। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से ही पांडवों के कष्ट दूर हुए, उन्हें अपना खोया हुआ राज्य वापस मिला और अंततः महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त हुई। एक अन्य कथा के अनुसार, सुमंत ऋषि की पुत्री सुशीला अपने पति कौंडिन्य के साथ जब अनंत सूत्र का अनादर कर उसे नदी में फेंक देते हैं, तो उन्हें कई कष्टों का सामना करना पड़ता है। बाद में पश्चाताप कर पुनः विधि-विधान से व्रत करने पर उनके सभी संकट दूर होते हैं। इसी कथा से अनंत सूत्र के महत्व और श्रद्धा की सीख मिलती है।

अनंत सूत्र बांधने की परंपरा क्यों है खास?:
अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद रेशम या सूती धागे से बना एक विशेष डोरा, जिसमें 14 गांठें लगाई जाती हैं, हाथ की कलाई पर बांधा जाता है। इसे ही “अनंत सूत्र” कहा जाता है।

14 गांठों का रहस्य:
इस सूत्र में 14 गांठें लगाने के पीछे भी एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। शास्त्रों में 14 लोकों का उल्लेख मिलता है, और माना जाता है कि यह सूत्र इन्हीं 14 लोकों में व्याप्त भगवान विष्णु की अनंत शक्ति का प्रतीक है। कुछ मान्यताओं के अनुसार यह 14 वर्षों के उस वनवास का भी प्रतीक है, जो भगवान राम या पांडवों ने भोगा था।

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पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग नियम:
परंपरा के अनुसार पुरुष इस सूत्र को दाहिने हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में धारण करती हैं। मान्यता है कि यह सूत्र व्यक्ति की रक्षा करता है, जीवन में आने वाली विपत्तियों को दूर करता है और सुख-समृद्धि प्रदान करता है। इसे तब तक धारण किया जाता है जब तक यह अपने आप टूट न जाए, हालांकि कई लोग अगली अनंत चतुर्दशी तक भी इसे पहने रखते हैं।

 

गणेश विसर्जन से क्या संबंध है?:
यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन, दोनों की तिथि एक ही दिन पड़ती है। इसका कारण कोई सीधा धार्मिक संबंध नहीं, बल्कि पंचांग की गणना और परंपरा का मेल है।

गणेशोत्सव की समय-सीमा:
भगवान गणेश की प्रतिमा की स्थापना भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि (गणेश चतुर्थी) को की जाती है। शास्त्रों और परंपरा के अनुसार गणपति बप्पा को घर में या पंडाल में 1.5, 3, 5, 7 या पूरे 10 दिनों तक विराजमान रखा जाता है। जो लोग पूरे 10 दिन गणेशजी को अपने घर रखते हैं, उनके लिए दसवां दिन ठीक अनंत चतुर्दशी के दिन ही आता है – यही कारण है कि गणेश विसर्जन का सबसे बड़ा और भव्य दिन अनंत चतुर्दशी के साथ जुड़ गया है।

चुनाव आयुक्तों की टिप्पणी- ज्ञानादेश अनधिकृत और गैरकानूनी: रंजन श्रीवास्तव

अनंत चतुर्दशी पूजा विधि:

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा स्थान को शुद्ध कर एक चौकी पर जलयुक्त कलश स्थापित करें।
  • कलश के पास भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर रखें।
  • विष्णु जी को रोली, चंदन, अक्षत, फूल, तुलसी दल और पीला वस्त्र अर्पित करें।
  • 14 गांठों वाला अनंत सूत्र भगवान के सामने रखकर उसकी भी पूजा करें।
  • धूप-दीप जलाकर पंचामृत या मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
  • अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा का श्रवण करें।
  • “ॐ जय जगदीश हरे” के साथ भगवान विष्णु की आरती करें।
  • पूजा के बाद पुरुष दाहिने हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में अनंत सूत्र बांधें।
  • सूत्र को तब तक धारण रखें जब तक वह स्वयं न टूट जाए।
  • इसी दिन गणपति बप्पा की अंतिम आरती और विशेष पूजा करें।
  • मोदक-लड्डू का भोग लगाकर “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारों के साथ शोभायात्रा निकालें।
  • नदी, तालाब या कृत्रिम कुंड में विधिवत मंत्रोच्चार के साथ गणेश प्रतिमा का विसर्जन करें।
  • शाम को पूजा और विसर्जन संपन्न होने के बाद ही व्रत का पारण करें।