महिला आरक्षण पर सियासी रार – संजीव वर्मा

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महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार द्वारा गुरुवार 16 अप्रैल से संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाए जाने को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इसे लेकर तलवारें खींच गई हैं । सत्ता पक्ष ने इसे महिला आरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है, तो विपक्ष ने सत्र के समय को लेकर गंभीर सवाल उठाया हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा के फ्लोर लीडर्स को पत्र लिखकर सभी दलों से एकजुट होकर ऐतिहासिक संशोधन विधेयक को पारित करने की अपील की है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि देश में महिला आरक्षण कानून को प्रभावी रूप से लागू करने का समय आ गया है। वहीं, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा है कि संसद का विशेष सत्र महिलाओं के लिए आरक्षण के बजाय परिसीमन के मुद्दे पर बुलाया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार की परिसीमन योजना अत्यंत खतरनाक है। यह संविधान पर सीधा हमला है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री विपक्ष से उन विधेयक पर समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें वे संसद के विशेष सत्र में जबरदस्ती पारित कराना चाहते हैं। जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से विधेयक के लिए जल्दबाजी की जा रही है उससे लगता है कि वे राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। वैसे 1990 के दशक से ही संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की मांग उठती रही है। लेकिन राजनीतिक सहमति के अभाव में यह विधेयक बार-बार अटकता रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सितंबर 2023 में यह विधेयक संसद से सर्वसम्मति से पारित हुआ था और उस समय कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने इसे तुरंत लागू करने की मांग की थी। लेकिन अब करीब 30 महीने बाद अचानक इसे लेकर सरकार विशेष सत्र बुला रही है। यही वजह है कि सरकार की मंशा पर विपक्षी दल ऊंगली उठा रहे हैं। विपक्ष की मांग है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा के हो रहे चुनाव के खत्म होने के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, ताकि परिसीमन और कानून में बदलाव पर विस्तार से चर्चा हो सके। उन्होंने सीधे-सीधे सरकार पर राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया। वैसे, विपक्ष की आपत्तियां भी पूरी तरह निराधार नहीं हैं। महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा की मांग और इसके क्रियान्वयन को जनगणना व परिसीमन से जोडऩे का मुद्दा-ये दोनों ही ऐसे प्रश्न हैं जिन पर गंभीर विचार-विमर्श जरूरी है। ये विपक्ष की पुरानी मांग रही है। यदि इन पहलुओं को पर्याप्त समय और महत्व नहीं दिया गया, तो यह विधेयक अपने उद्देश्य से भटक सकता है। इसके अलावा, इस सत्र के समय को लेकर भी राजनीतिक व्याख्याएं हो रही हैं। चुनावों के मद्देनजर इसे एक रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जहां महिला मतदाताओं को साधने का प्रयास किया जा रहा है। अगर ऐसा है, तो यह चिंता का विषय है कि क्या महिला सशक्तिकरण जैसे गंभीर मुद्दे भी चुनावी गणित का हिस्सा बनते जा रहे हैं। महिला आरक्षण विधेयक का महत्व उसकी घोषणा में नहीं, बल्कि उसके प्रभावी और न्यायसंगत क्रियान्वयन में निहित है। यदि यह सत्र उस दिशा में ठोस कदम उठाने का मंच बनता है, तो यह स्वागतयोग्य होगा। लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बनकर रह जाता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ न्याय नहीं होगा। ऐसे में सभी दलों को चाहिए कि वे संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने की ईमानदार कोशिश करें, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा कर पाएगा।