SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार नहीं, वोटर लिस्ट तक सीमित है EC की भूमिका

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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग की भूमिका मतदाता सूची के नियंत्रण, पर्यवेक्षण और चुनाव प्रक्रिया तक सीमित है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम नहीं होने से किसी व्यक्ति की नागरिकता अपने आप समाप्त नहीं हो जाती। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून की स्थिति को लेकर कोई भ्रम नहीं है। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि नागरिकता तय करने का अधिकार निर्वाचन आयोग के पास नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि SIR प्रक्रिया से जुड़े 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों के कामकाज में व्यावहारिक स्तर पर असंगतियां और देरी सामने आ रही हैं। याचिकाकर्ता पक्ष ने ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली में आ रही दिक्कतों का मुद्दा उठाया और कहा कि इससे मामलों के निपटारे पर असर पड़ रहा है। दरअसल, चुनाव आयोग देश में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया चला रहा है। इस दौरान कुछ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने को लेकर नागरिकता संबंधी सवाल उठे, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इससे पहले मई में भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को राहत देते हुए कहा था कि बिहार में वोटर लिस्ट के SIR का आदेश देना आयोग के अधिकार क्षेत्र के बाहर नहीं है। अदालत ने माना था कि इस प्रक्रिया में रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट (RP Act) का उल्लंघन नहीं हुआ है। मामले की अगली सुनवाई अब 25 अगस्त को होगी।