o 50 रुपये का नादिया बैल, 100 रुपये में बिक रहा पोरा जाता; आधुनिकता के दौर में घट रहा पारंपरिक खिलौनों का क्रेज
कांकेर/ दुर्गूकोंदल। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकपर्व पोला को लेकर जिला में तैयारियां शुरू हो गई हैं। आगामी 10 सितंबर को पूरे अंचल में पोला पर्व मनाया जाएगा। पर्व को लेकर किसान अपने घरों और कृषि उपकरणों की साफ-सफाई सहित अन्य तैयारियों में जुट गए हैं। वहीं दुर्गूकोंदल के साप्ताहिक बाजार में पोला पर्व से जुड़े मिट्टी के खिलौने और नादिया बैल सजकर बिक्री के लिए पहुंचने लगे हैं।
बाजार में इन दिनों मिट्टी के नादिया बैल, पोला खिलौने तथा लकड़ी के बने नादिया बैल लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। बाजार में कुम्हारों द्वारा पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए मिट्टी के बैल बिक्री के लिए रखे गए हैं। हालांकि बाजार में इन पारंपरिक खिलौनों की बिक्री पहले की तुलना में कम होने की बात कुम्हारों द्वारा कही जा रही है।
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कुम्हारों ने बताया कि इस वर्ष मिट्टी का नादिया बैल करीब 50 रुपये तथा पोरा जाता करीब 100 रुपये में बेचा जा रहा है। इसके अलावा लकड़ी से तैयार किए गए नादिया बैल भी बाजार में उपलब्ध हैं। उनका कहना है कि पहले पोला पर्व के दौरान मिट्टी के बैल और अन्य पारंपरिक खिलौनों की अच्छी बिक्री होती थी, लेकिन समय के साथ इनकी मांग में कमी आई है।
कुम्हारों के अनुसार, आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण पोला एवं नादिया बैल जैसे पारंपरिक खिलौनों का महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। नई पीढ़ी में इन पारंपरिक खिलौनों के प्रति पहले जैसी रुचि दिखाई नहीं देती। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई परिवार पोला पर्व की परंपरा को कायम रखते हुए मिट्टी के बैल और पोला खिलौने खरीदते हैं।
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पोला पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। कृषि कार्य में बैलों की महत्वपूर्ण भूमिका होने के कारण इस दिन किसान अपने बैलों को नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। ग्रामीण अंचलों में यह पर्व कृषि संस्कृति, पशुधन के प्रति सम्मान और किसान जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। क्षेत्र के किसानों ने बताया कि पोला पर्व को लेकर वे अपने घरों और पशुधन की तैयारियों में जुटे हैं। पर्व के अवसर पर बैलों को सजाया जाएगा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की जाएगी।
जिला के बाजार में सजे मिट्टी के बैल यह याद दिला रहे हैं कि बदलते समय के बावजूद छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराएं आज भी गांवों की संस्कृति में जीवित हैं। जरूरत है कि नई पीढ़ी को इन लोकपर्वों और पारंपरिक कलाओं से जोड़ा जाए, ताकि कुम्हारों की कला और पोला पर्व की सदियों पुरानी परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।
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