दिल्ली में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर अभियान के तहत देश की तमाम दिग्गज हस्तियों जिनमें पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, चुनाव आयुक्त एसएस संधू और पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ शामिल हैं-को चुनाव आयोग द्वारा नोटिस जारी किया जाना अपने आप में एक चौंकाने वाला और गंभीर विषय है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मतदाता सूचियां बनाने में कितनी लापरवाही और लेतलाली बरीती गई। देखने में तो चुनाव आयोग द्वारा की जा रही यह सत्यापन प्रक्रिया बहुत सख्त लग रही है, जिसके दायरे से देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे या रह चुके लोग भी अछूते नहीं रहे हैं। लेकिन कई राज्यों में भौतिक सत्यापन के बावजूद लाखों योग्य मतदाताओं के नाम एसआईआर में हटाए जाने के मामले भी सामने आ रहे हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, 33.13 लाख मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म की जानकारियों में गड़बड़ी या पुरानी सूचियों से नाम और रिकॉर्ड का मिलान यानि मैपिंग न हो पाने के कारण नोटिस मिले हैं। हालांकि, इसे एक सामान्य प्रशासनिक और तकनीकी सुधार प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए, ताकि मतदाता सूची पूरी तरह त्रुटिहीन और पारदर्शी बन सके। फर्जी, दोहरी प्रविष्टियों या मृत मतदाताओं के नाम सूची से हटाना लोकतंत्र की निष्पक्षता के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन दूसरी ओर, यह स्थिति इस बात की भी याद दिलाती है कि आम नागरिकों के साथ-साथ विशिष्ट लोगों को भी इस प्रक्रिया के दौरान कितनी तकनीकी और व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। जब देश के सबसे अनुभवी राजनेता और शीर्ष अधिकारी भी डेटा मिसमैच की समस्या से दो-चार हो रहे हैं, तो आम जनता की परेशानियों का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यह प्रक्रिया केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग द्वारा 14 मई को घोषित इस तीसरे चरण के तहत देश के 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में 36.73 करोड़ वोटरों का वेरिफिकेशन किया जा रहा है। नगालैंड जैसे राज्यों के हालिया आंकड़े यह दर्शाते हैं कि पुनरीक्षण के दौरान किस बड़े पैमाने पर मृत, स्थानांतरित या एक से अधिक जगहों पर पंजीकृत मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। हालांकि, डिजिटल मैपिंग और डेटा एंट्री के दौरान होने वाली तकनीकी खामियां कई बार पात्र और जीवित मतदाताओं के लिए भी असमंजस की स्थिति पैदा कर देती हैं। यही वजह है कि इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है, जहां इस पर सुनवाई होनी है। आगामी 4 नवंबर को अंतिम मतदाता सूची जारी होनी है और 29 अक्टूबर तक का समय जवाब देने के लिए तय किया गया है। ऐसे में, सीमित समय सीमा और दस्तावेजों को जुटाने की भागदौड़ के बीच चुनाव आयोग की यह नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि किसी भी वैध और वास्तविक मतदाता का नाम तकनीकी या प्रशासनिक खामियों की वजह से सूची से बाहर न हो। सत्यापन अभियान सुशासन और निष्पक्ष चुनाव की दिशा में एक स्वागत योग्य कदम है, बशर्ते इसे अत्यधिक जटिल और बोझिल बनाने के बजाय नागरिकों के लिए सहज, पारदर्शी और सुगम बनाया जाए, ताकि लोकतंत्र के इस महापर्व में हर पात्र नागरिक की भागीदारी सुरक्षित रह सके। विपक्षी पार्टियां लगातार एसआईआर के तहत हजारों नहीं, अपितु लाखों मतदाताओं के नाम काटे जाने के आरोप लगाती आ रही हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र में तो चुनाव के पहले जिस तरह से एसआईआर का अभियान चलाया गया, उसमें सैकड़ों लोगों ने स्वयं ही उनके नाम काटे जाने की आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन उनके नाम उस समय तो नहीं जोड़े गए। कई जगह नाम जोड़े भी गए तो चुनाव के बाद, इससे विपक्षी पार्टियों को चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने का अवसर भी मिला। यह भी आरोप लगाए जाते रहे हैं कि सत्ता पक्ष को चुनाव में फायदा पहुंचाने के लिए ही एसआईआर अभियान चलाया गया। असल में मतदाता सूचियों में नाम जोडने और हटाने की जिम्मेदारी भले ही प्रशासनिक अधिकारियों की होती है, लेकिन इसमें सत्तापक्ष के हस्तक्षेप के आरोप लगातार लगते आ रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है और जहां सत्तापक्ष को हार का भय होता है, वहीं के मतदाताओं के नाम एसआईआर के तहत काटे जा रहे हैं या काटे गए हैं। हालांकि चुनाव आयोग लगातार इससे इंकार कर रहा है, लेकिन जिस तरह से मतदाताओं की व्यक्तिगत आपत्तियां आ रही हैं, उससे कहीं न कहीं विपक्ष के आरोप सही साबित होते भी दिख रहे हैं। फिलहाल तो दिल्ली में चल रहे एसआईआर की खबरें सुर्खियों में हैं। और जानी मानी हस्तियों को नोटिस दिये गये हैं। इसमें लोगों को व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होकर जानकारी सही करानी होगी। बाकी कुछ खास होना भी नहीं है। लेकिन चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर जो सवाल उठ रहे हैं, उनका ठोस जवाब नहीं आ रहा है।
एसआईआर में दिग्गज हस्तियों को नोटिस- संजय सक्सेना
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