नीति आयोग का खुलासा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर सवाल- संजय सक्सेना

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नीति आयोग की एक हालिया रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया गया है। और वो ये कि 15 से 29 आयु वर्ग अनुमानित 8.7 करोड़ भारतीय युवा न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न काम कर रहे हैं और न ही कोई प्रशिक्षण ले रहे हैं। यह आंकड़ा रियायती प्रशिक्षण कार्यक्रमों की तत्काल आवश्यकता को दर्शाता है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य स्वरोजगार को बढ़ावा देना और स्थानीय मांग व उभरते क्षेत्रों के अनुरूप कौशल प्रदान करना है। कामगारों और सीखने वालों के पांच वर्ग- आयोग ने विकसित भारत 2047 के लिए कौशल विकास की पुनर्कल्पना, नामक अपनी रिपोर्ट में यह अनुमान प्रस्तुत किया है। यह आंकड़ा 2021 में किए गए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 78वें चरण के आंकड़ों पर आधारित है। आयोग ने भारत के कार्यबल परिदृश्य और सीखने वालों को पांच खंडों में बांटा है। इनमें स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, औपचारिक और अनौपचारिक कार्य, शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर वाले युवाओं को नीट युवा कहा है। नीट यानि एनईईटी- नॉट इन एजुकेशन, एम्प्लायमेंट और ट्रेनिंग। इसमें युवा महिलाएं शामिल हैं। नीति आयोग ने नीट युवाओं को 15 से 29 वर्ष की आयु के ऐसे व्यक्तियों के रूप में परिभाषित किया है। ये वे युवा हैं जो शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में संलग्न नहीं हैं। इसमें बेरोजगार युवा भी शामिल हैं। नीट युवा आय की कमी और पिछली शिक्षा की डूबी हुई लागत से बाधित होते हैं। उन्हें किफायती या रियायती प्रशिक्षण विकल्पों की आवश्यकता है। साथ ही, उन्हें समर्पित वित्तीय सहायता भी चाहिए जहां बाधाएं सबसे अधिक बाध्यकारी हों। रिपोर्ट में बहुत गंभीर आंकड़े सामने आए हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ 8.25 फीसदी स्नातक ही ऐसे काम में लगे हैं, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप है। नीति आयोग ने कहा कि व्यावहारिक शिक्षा और उद्योग की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षण की कमी के कारण डिग्रीधारी युवाओं की रोजगार क्षमता भी प्रभावित हो रही है और उनकी प्रतिभा भी खत्म होती जा रही है। नीति आयोग ने एनईईटी युवाओं और महिलाओं के लिए सस्ते या सब्सिडी वाले प्रशिक्षण के साथ जरूरत के अनुसार आर्थिक मदद देने की सिफारिश की है। कामगारों और युवाओं के लिए दोबारा कौशल सीखने, स्वरोजगार और स्थानीय जरूरतों तथा उभरते क्षेत्रों से जुड़े प्रशिक्षण पर जोर दिया गया है। नीति आयोग के अनुसार, 2014-15 से अब तक 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। आयोग का कहना है कि विकसित भारत 2047 का लक्ष्य तभी हासिल होगा, जब लोगों को लगातार सीखने, कमाने और आगे बढऩे के पर्याप्त अवसर मिलें। आयोग का कहना है कि इतने लोगों को प्रशिक्षण देने के बाद भी सफर अभी लंबा है। आयोग का सुझाव है कि युवाओं को स्थानीय मांग, ग्रीन इंडस्ट्री और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (ईवी) जैसे उभरते हुए सेक्टर्स के हिसाब से ट्रेनिंग दी जाए। साथ ही छोटे और मध्यम उद्योगों में इंटर्नशिप के मौके बढ़ाए जाएं। आयोग का माना है कि छात्र, विशेषकर कम आय वाले परिवारों से, पहले से ही कॉलेज के खर्चों से बोझ तले दबे हैं। कई मामलों में वे निजी ट्यूशन का भी खर्च उठाते हैं। परिणामस्वरूप, पारंपरिक डिग्री के साथ सशुल्क कौशल विकास में अतिरिक्त निवेश करना अक्सर आर्थिक रूप से अव्यवहारिक होता है। कई छात्र स्नातक होने के बाद परिवारों का समर्थन करने के लिए औपचारिक नौकरी या आय स्रोत चुनते हैं। वे अक्सर कम वेतन वाली स्थिर आय वाली नौकरी भी स्वीकार कर लेते हैं। रिपोर्ट में इस बात पर भी खेद व्यक्त किया गया है कि केवल 8.25 फीसदी स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुरूप भूमिकाओं में कार्यरत हैं। व्यावहारिक शिक्षा और उद्योग-संरेखित प्रशिक्षण का सीमित अनुभव रोजगार क्षमता को बाधित करता रहता है। यह औपचारिक रूप से शिक्षित युवाओं में भी देखा जाता है। नीति आयोग ने कहा कि विकसित भारत 2047 की भारत की महत्वाकांक्षा नागरिकों को लगातार सीखने, कमाने और आगे बढऩे में सक्षम बनाने पर निर्भर करती है। कौशल विकास इस लक्ष्य के लिए केंद्रीय है। नीति आयोग की रिपोर्ट की कोशिश होती है कि सरकार की योजनाओं की असफलता को किसी भी तरह से ढांका जाए और सिफारिश के रूप में कुछ सलाह दी जाए। यही इसमें और सीएजी में अंतर है। हालांकि ना-ना करते हुए नीति आयोग ने बहुत कुछ कह भी दिया है। युवाओं को जो काम मिल रहा है, वो उनकी योग्यता या प्रतिभा के अनुसार तो है ही नहीं, उन्हें जिस काम का प्रशिक्षण दिया गया, उसके अनुसार भी अधिकांश बच्चों को काम नहीं मिल पा रहा है। यानि साफ है कि हम अपने युवाओं के कौशल और उनकी क्षमताओं का सही उपयोग ही नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि यह केवल सरकार की कमी है, यह कहना भी उचित नहीं होगा। सरकार पर्याप्त रोजगार ही उपलब्ध नहीं करा पा रही है, तो योग्यता या प्रशिक्षण के अनुसार रोजगार दिला पाने की बात दूर की कौड़ी ही कही जाएगी। इसमें हमारे अभिभावकों और समाज को भी उतनी ही जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है। लेकिन देखा यह जाता है कि हम सब कुछ सरकार पर डाल कर अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं। वर्तमान दौर में सभी अपनी रोटियां सेकने में व्यस्त हैं। ऐसे में यदि जेन जी के नाम वाली नई पीढ़ी अपने अधिकारों के लिए उग्र होती है, तो हम परेशान हो जाते हैं। निश्चित तौर पर नीति आयोग की इस रिपोर्ट पर गौर करते हुए बच्चों को उनकी योग्यता नहीं तो कम से कम वो काम तो दिया जाना चाहिए, जिसकी उन्हें ट्रेनिंग दी गई है। नहीं तो, उस प्रशिक्षण पर किया गया लाखों-करोड़ों का खर्च भी बेकार चला जाएगा। सीधी बात ये भी है कि जब प्रशिक्षण के अनुसार हम बच्चों को काम नहीं दे पा रहे हैं, तो ये प्रशिक्षण कार्यक्रम भी बेमानी ही कहे जाएंगे? दस प्रतिशत से भी कम उपलब्धि को हम सफलता के आंकड़ों में कैसे शुमार कर सकते हैं?