नई दिल्ली। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ‘स्मार्ट’ कैंसर रोधी दवा विकसित की है, जिसे मुख्य रूप से कैंसर कोशिकाओं के भीतर सक्रिय होने के लिए डिजाइन किया गया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, शुरुआती प्रीक्लिनिकल अध्ययनों में इस दवा ने आक्रामक ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर कोशिकाओं के खिलाफ प्रभाव दिखाया है, जबकि स्वस्थ कोशिकाओं पर इसका असर बहुत कम पाया गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, आगे के अध्ययन सफल रहने पर यह तकनीक भविष्य में पारंपरिक कीमोथेरेपी के संभावित विकल्प के रूप में विकसित की जा सकती है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएएसएसटी) के डॉ. असीस बाला और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-गुवाहाटी के डॉ. के.पी. भाबक के नेतृत्व में किये गये सहयोगात्मक शोध में आरके-251 नामक इस दवा को विकसित किया गया है।
Read more:- पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का निधन
पारंपरिक कैंसर उपचार की एक बड़ी चुनौती यह है कि दवाएं कैंसर कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिससे कई तरह के दुष्प्रभाव होते हैं। इसी को देखते हुए वैज्ञानिक ऐसी लक्षित उपचार पद्धतियां विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जो सामान्य ऊतकों में अपेक्षाकृत निष्क्रिय रहें और ट्यूमर कोशिकाओं में सक्रिय हों।
- आरके-251 इसी सिद्धांत पर आधारित है।
- कैंसर कोशिकाओं में आमतौर पर रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (आरओएस) का स्तर अधिक होता है।
- वैज्ञानिकों के अनुसार, जब आरके-251 कैंसर कोशिका के भीतर पहुंचता है तो आरओएस का उच्च स्तर दवा के सक्रियण को ट्रिगर करता है।
- इसके बाद इससे ‘एनबीडीएचईएक्स’ नामक शक्तिशाली कैंसररोधी यौगिक मुक्त होता है।
यह यौगिक ऐसे लक्षित प्रोटीनों को अवरुद्ध करता है, जिनका इस्तेमाल कई कैंसर कोशिकाएं जीवित रहने और उपचार के प्रति प्रतिरोध विकसित करने के लिए करती हैं। प्रीक्लिनिकल परीक्षणों में आरके-251 ने ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर कोशिकाओं के खिलाफ प्रभावी गतिविधि दिखायी। वहीं, स्वस्थ कोशिकाओं पर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम पाया गया, जिससे इसके लक्षित उपचार के रूप में संभावित उपयोग के संकेत मिले हैं।
Read more:- SC का बड़ा फैसला: बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं माता-पिता
वैज्ञानिकों ने जेब्राफिश भ्रूणों में भी उम्मीदवार दवा के व्यवहार का अध्ययन किया। अध्ययन में स्पष्ट विषाक्तता के संकेत नहीं मिले। साथ ही आरओएस की मौजूदगी में अपेक्षित फ्लोरेसेंस देखा गया, जो दवा के सक्रिय होने की प्रक्रिया के अनुरूप था।
आरके-251 को मानव रोगियों में इस्तेमाल किये जाने से पहले आगे व्यापक प्रीक्लिनिकल अध्ययन और सुरक्षा एवं प्रभावशीलता का सत्यापन जरूरी होगा। फिलहाल यह दवा विकास के शुरुआती चरण में है और मनुष्यों पर इसके परीक्षण से संबंधित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। शोध से संबंधित अध्ययन ‘एसीएस जर्नल ऑफ मेडिसिनल केमिस्ट्री’ में प्रकाशित हुआ है।

